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20100415

अमेरिका की नकल न करे भारत

दूरसंचार विशेषज्ञ सैम पित्रोदा ने कहा है कि हमें विकास के लिए अमेरिका के खपत आधारित आर्थिक मॉडल की जगह ऐसा स्वदेशी मॉडल विकसित करना चाहिए जिसमें कम लागत वाले उपायों पर जोर हो. निजी तौर पर उनका मानना है कि अमेरिकी मॉडल देश के लिए उपयुक्त नहीं है.

राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के अध्यक्ष पित्रोदा ने यह बात माइक्रोसॉफ्ट द्वारा आयोजित ‘टेकएड 2010’ में शामिल प्रतिनिधियों को शिकागो से वीडियोकान्फ्रेंसिंग से संबोधित करते हुए कही.

उन्होंने कहा कि देश की अपनी चुनौतियां हैं और हमें ऐसे मॉडल की जरूरत है जिसमें कम लागत वाले उपायों पर जोर हो. नए तरीके खोजने की पहल हमें खुद करनी चाहिए. भारत को शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में विकास के नए मॉडल पर गौर करने की जरूरत है.

ग्रामीण क्षेत्रों में संभावना
प्रधानमंत्री के दूरसंचार सलाहकार पित्रोदा ने कहा कि भारत का ग्रामीण क्षेत्र शहरी क्षेत्रों के लिए आउटसोर्सिंग हब बन सकता है. उनके अनुसार कंप्यूटरीकरण, ई-फाइलों और ब्रॉडबैंड के युग में व्यस्त-महंगे शहरों में सरकारी दफ्तरों की जरूरत नहीं है. इसके लिए ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे का निर्माण ऐसी सरकारी सेवाओं के लिए मददगार साबित हो सकता है.

शुरू होने को है दूसरे चरण की क्रांति

पित्रोदा ने कहा कि सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के पहले चरण की क्रांति देश में खत्म होने वाली है और दूसरे चरण की शुरुआत होने वाली है. इस दूसरे चरण का समाज पर व्यापक असर होगा.

(www.bhaskar.com)

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कोई भी मूल्य एवं संस्कृति तब तक जीवित नहीं रह सकती जब तक वह आचरण में नहीं है.

20090609

गरीबी मिटाने का नया नारा

विश्व बैंक की ओर से जारी की गई ताजी रिपोर्ट मनमोहन सिंह सरकार के दावों के विपरीत गरीबी की भयावहता को उजागर करती है. पहले भी यह दावा किया जाता रहा कि कांग्रेस की सरकार के दौरान गरीबी घटी है और व्यापक आर्थिक विकास हुआ है और अब एक बार फिर संप्रग सरकार के एजेंडे के रूप में गरीबी के उन्मूलन का संकल्प व्यक्त किया जा रहा है. इसमें संदेह नहीं कि देश का विकास हुआ है, लेकिन विकास की दर जब नौ फीसदी से ज्यादा थी तब भी देश के ८४ करोड़ लोगों को बीस रुपए रोज भी नहीं मिल रहे थे. यह कोई विपक्षी दलों का आरोप नहीं है, बल्कि सरकार के बनाए अर्जुन सेन गुप्त आयोग की रिपोर्ट है. अब खुद विश्व बैंक ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि उदारवादी विकास के इन वर्षो में बेरोजगारी और कुल गरीबी बढ़ती गई है.

विश्व बैंक की एक रिपोर्ट 'ग्लोबल इकोनामिक प्रास्पेक्ट्स फार 2009' में यह चेतावनी दी गई है कि 2015 में भारत की एक चौथाई आबादी चरम निर्धनता की शिकार हो जाएगी. इस रिपोर्ट के अनुसार 1990 से 2005 के बीच भारत में घोर गरीबी के शिकार लोगों में लगभग दो करोड़ की वृद्धि हुई. इस अवधि के दौरान मनमोहन सिंह वित्त मंत्री, आर्थिक सलाहकार और फिर प्रधानमंत्री रहे. कांग्रेस ने उन्हें दोबारा प्रधानमंत्री बनाया है. राहुल गांधी कहते हैं कि कांग्रेस और कम्युनिस्टों में बहुत सी समानताएं हैं. मतभेद सिर्फ विचारधारा के हैं. वे विकास में विश्वास नहीं रखते, हम उसे जरूरी मानते हैं. वह राजीव गांधी की उस बात को भी दोहराते हैं कि दिल्ली से भेजे गए एक रुपए में से गरीब तक सिर्फ दस पैसे पहुंच पाते हैं. राजीव गांधी ने 15 पैसे बताए थे. इस दौरान पांच पैसे और कम हो गए. राहुल गांधी के अनुसार यह हमारी वितरण प्रणाली के कारण है. हमारे विशालकाय प्रशासनिक ढांचे को जब तक ठीक नहीं किया जाएगा यह गड़बड़ी चलती रहेगी। पर यह ठीक कैसे होगा?

संप्रग ने सत्ता में आने के आठ महीने के भीतर 55 समितियां बनाईं, जिनमें कुछ के अध्यक्ष तो प्रधानमंत्री थे, लेकिन फिर भी कुछ नहीं बदला. कांग्रेसी नेता वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता में प्रशासनिक सुधार आयोग ने 12 रपट पेश कीं, लेकिन कोई नहीं जानता कि उनमें से कोई लागू की गई या नहीं?

असली समस्या यह है कि व्यवस्था ने खुद को जवाबदेही से बचा रखा है. विशेषज्ञों की भी राय है कि मुद्दा पैसे का नहीं, बल्कि सुझावों पर अमल का है. सुधारों का अभाव हर क्षेत्र में महसूस किया जा रहा है-सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं के मामले में ही नहीं, बल्कि सुरक्षा के संदर्भ में भी. इससे अधिक निराशाजनक कुछ और नहीं कि सुधारों की बातें तो रह-रहकर विभिन्न मंचों से सुनाई देती रहती हैं, लेकिन वे बस सुझावों और संकल्पों तक सीमित हैं.

यदि अगले कुछ दशकों में हमारे श्रमिक बल में शामिल होने वाले 27 करोड़ नए लोग आजीविका, रोजगार, कार्यकौशल और शिक्षा से वंचित रहेंगे तो हमें भारी सामाजिक और सांस्कृतिक उथल-पुथल का सामना करना पड़ सकता है. हमारे पास दस लाख से अधिक आबादी वाले फिलहाल 27 शहर हैं. असंगठित क्षेत्र में 93 प्रतिशत श्रमिकों को रोजगार मिला हुआ है. 50 प्रतिशत श्रमिक स्वरोजगार में लगे हैं लेकिन यह ऐसी उद्यमिता नही है जो रोजगार और दौलत पैदा कर सके. हमारे 1400 रोजगार दफ्तरों ने चार करोड़ पंजीकृत लोगों में से केवल दो लाख को रोजगार दिया. यह आवश्यक है कि सर्व शिक्षा अभियान में धन को छात्रों की शिक्षा के बजाय नतीजे से और नरेगा में कौशल, प्रशिक्षण से जोड़ा जाए. आज 30 करोड़ लोग न पढ़ सकते हैं, न उनमें कार्यकौशल है, लेकिन अपनी व्यवस्था बदलकर हम सोलह करोड़ लोगों को अगले 20 साल में गरीबी से बचा सकते हैं. सुधार की इस प्रक्रिया की पहल के लिए सरकार को अपने एजेंडे को केंद्रीकृत बनाना होगा ताकि स्कूली, व्यावसायिक और उच्चतर शिक्षा में खामियों को दूर किया जा सके. संप्रग सरकार को दीर्घकालीन परिवर्तनों को ध्यान में रखकर शिक्षा प्रणाली में सुधार की पहल करनी होगी. तभी हम ज्ञान की वैश्विक अर्थव्यवस्था में स्पर्धा कर सकते हैं.

यह कम चिंता की बात नहीं है कि आजादी के 62 सालों के बाद भी हम अपने बुनियादी ढांचे का सही तरह विकास नहीं कर पाए हैं. दरअसल समस्या यह है कि हमने फैसले लेने के कई स्तर और कई एजेंसियां स्थापित कर दी हैं. कोई भी काम करने के लिए हमें कई मंजूरियां लेनी पड़ती हैं. होता यह है कि सरकार कुछ करने के लिए कोई फैसला लेती है और मामला मंजूरी के लिए जाता है. हर विभाग संभवत: अपने अहं के चलते पूरी परियोजना पर ही सवाल उठा देता है और सरकार का फैसला उलट जाता है. हमारे पास विचार हैं, लेकिन हम नहीं जानते कि उन पर अमल कैसे किया जाए? इस गड़बड़झाले से मुक्ति पानी चाहिए. असल में हमें नेतृत्व की जरूरत है -सिर्फ राजनीति में नहीं, बल्कि प्रशासन में भी जिम्मेदार और जवाबदेह व्यवस्था बनाए जाने की आवश्यकता है. ग्रामीणों को रोजगार का प्रशिक्षण और सहायता देकर हम गरीबी और भुखमरी को मिटा सकते हैं.

नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस ने बांग्लादेश के गांवों में बैंक खोलकर जरूरतमंदों को जरूरी सहायता माइक्रो फाइनेसिंग के जरिए देकर कई गांवों की तस्वीर बदल दी है. भारत में भी नीड जैसी कुछ संस्थाएं यह काम कर सकती हैं. इसका विस्तार किया जाना चाहिए-खासकर उन क्षेत्रों में जहां ज्यादा गरीबी है और रोजगार के अवसर नहीं हैं. हुनर सिखाकर और आवश्यक मदद देकर जब किसी व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाया जाता है तो उसमें अलग किस्म का आत्मविश्वास पैदा होता है और वह देश के लिए बोझ नहीं, बल्कि उत्पादन में भागीदार बन जाता है. क्या मनमोहन सिंह और मोंटेक सिंह अहलूवालिया का योजना आयोग यह काम कर पाएगा? यह कांग्रेस और उसकी गठबंधन सरकार को तय करना है कि वह देश में गरीबी और भुखमरी कैसे मिटाएगी?
(निरंकार सिंह)
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कोई भी मूल्य एवं संस्कृति तब तक जीवित नहीं रह सकती जब तक वह आचरण में नहीं है.

20090205

निशाने पर गाँव

अब तमाम निगाहें ग्रामीण भारत पर टिकी हैं. ट्रकों में लदा माल भी पास के किसी गांव में ही ले जाया जा रहा है. तात्पर्य यह है कि अब ग्रामीण भारत के साथ लूट-खसोट शुरू हो गई है. अधिक समय नहीं बीता है जब गांव की धूलभरी दुकान में सिर्फ तेल-साबुन, और मंजन जैसी चीजें ही मिलती थीं.
उद्योग जगत को लगता है कि ऋण माफी, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना और जबरदस्त फसल से ग्रामीण समुदाय के हाथ में अतिरिक्त नगदी आ गई है. इसलिए यह सही समय है कि ग्रामीण क्षेत्र के नवधनाढ्यों से नगदी झटक ली जाए. सवाल यह है कि क्या ग्रामीण भारत वास्तव में समृद्ध हो रहा है? या फिर यह औद्योगिक जगत का लालच है जो इसे देश के पृष्ठभाग की ओर खींच रहा है?
जमीनी धरातल की ओर देखने से पहले हमें यह देखना चाहिए कि बाजार की चाल बदल रही है. मोबाइल फोन ने पहले ही सीधा धावा बोल दिया है. सरकार प्रायोजित ई-गवर्नेस कार्यक्रम के माध्यम से कंयूटर की बिक्री में उछाल आ गया है. कार, स्कूटर-मोटरसाइकिल और उपभोक्ता वस्तुओं के निर्माता भी गांव के बाजार पर टकटकी लगाए हैं. कई नामी-गिरामी कंपनियों ने गांवों में अपना विशिष्ट विपणन अभियान छेड़ दिया है. वैवाहिक समारोहों से जुड़ी व्यावसायिक गतिविधियां भी छोटे कस्बों तक में पांव पसार चुकी हैं.
बड़ी कंपनियों के साथ-साथ अनेक छोटी कंपनियां भी दूसरे और तीसरे दर्जे के शहरों में मार्केटिंग अभियान छेड़ चुकी हैं. ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या ग्रामीण भारत में कोई आर्थिक क्रांति हो रही है? इसका जवाब है-नहीं. शीर्ष उद्योगपति इस उम्मीद में ग्रामीण बाजार में उतर रहे हैं कि भारत के गरीबों की जेब में अगर कुछ बचा रह गया है तो उसे भी निकाल लिया जाए. अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियां पहले ही स्पष्ट कर चुकी हैं कि उनकी कृषि अनुसंधान में कोई रुचि नहीं है. ये तो बस अपना माल बेचना चाहती हैं.
अनुबंध के तहत बाजार के अवसरों से असंतुष्ट दो अमेरिकी सीनेटरों ने मांग की है कि भारतीय कृषि बाजार की संभाव्यता को लेकर एक विस्तृत अध्ययन किया जाना चाहिए. उनकी दलील है कि भारतीय कृषि क्षेत्र को अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए खोल देना चाहिए. वर्तमान में केवल पांच प्रतिशत अमेरिकी उत्पादों की ही भारतीय कृषि क्षेत्र तक पहुंच है
पूरा दृश्य ऐसा है जैसे बाज नीचे उतरने लगे हैं-और वह भी चारों ओर से. गांव के चूहों को इस हमले से बचने के लिए सुरक्षित जगह मिलने में बड़ी दिक्कत हो रही है. कारण स्पष्ट है. अब तक शराब, चाहे अंग्रेजी हो या देशी, गांव को तबाह कर करती रही है. कृषि आय का बड़ा हिस्सा शराब की दुकानों पर नशे में उड़ जाता है.
क्या यह हैरत की बात नहीं कि अधिक खर्च करने के बाद भी ग्रामीण क्षेत्रों में अनाज की खपत बराबर गिर रही है? एक रिपोर्ट के अनुसार 1993-94 से 2006-07 में अनाज पर प्रति व्यक्ति प्रति माह खर्च की जाने वाली राशि 101 रुपये से बढ़कर 115 रुपये हो गई है, जबकि इस बीच अनाज की खपत में गिरावट आई है.
यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब असंगठित क्षेत्रों से संबंधित उद्यमों का राष्ट्रीय आयोग बहुत स्पष्ट तौर पर कह रहा है कि भारत की 77 फीसदी आबादी यानी 83.6 करोड़ लोग रोजाना बीस रुपये से कम पर गुजर-बसर कर रहे हैं. यह तय है कि 20 रुपये प्रतिदिन से दो जून की रोटी तक नहीं खाई जा सकती. इन करोड़ों भूखे लोगों को उपभोक्ता वस्तुओं के जरिए विकास के स्वप्न बेचने की बात निश्चित तौर पर हजम नहीं होती.
अभी तक आईसीआईसीआई के चेयरमैन द्वारा कुछ समय पहले की गई टिप्पणी की थाह नहीं ले पाया हूं. उन्होंने कहा था कि ग्रामीण क्षेत्र में बहुत सा रुपया है. अगर यह सच है तो मुझे कोई कारण समझ में नहीं आता कि वैश्विक भूख सूचकांक में 88 देशों में से भारत का 66वां स्थान कैसे रहा? जिन 18 राज्यों का संज्ञान लिया गया उनमें से 13 राज्यों में हालात 'खतरनाक' हैं. इनमें चमकता हुआ गुजरात, प्रौद्योगिक रूप से उन्नत कर्नाटक, खुदकुशी संभाव्य महाराष्ट्र और चावल का कटोरा तमिलनाडु शामिल हैं.
वास्तव में भूख सूचकांक में भारत अफ्रीकन सहारा के सीमांत राष्ट्रों से भी निचले दर्जे पर खड़ा है. यहां तक कि भारत का अन्नदाता पंजाब भी वियतनाम जैसे देशों से गया गुजरा है. भारत के गांव परंपरागत व्यापार चक्र उलट जाने का शिकार हुए हैं. काफी लंबे समय से गांवों में जितना धन निवेश किया जा रहा उससे अधिक बाहर निकाला जा रहा है.
कुछ अध्ययनों से पता चलता है कि गांवों में एक हजार एकड़ भूभाग से कृषि आधारित कंपनियां प्रतिवर्ष 30 करोड़ रुपये से 70 करोड़ रुपये तक खींच लेती हैं. यह रकम खाद, कीटनाशक, बीज और उपकरण आदि पर खर्च होती है. अगर केवल यह धनराशि ही गांवों से बाहर न जाने दी जाए तो भारतीय गांवों का चेहरा निश्चित तौर पर चमकदार और लालिमायुक्त हो जाएगा. इसके उपरांत गरीब और भोले-भाले ग्रामीणों का शोषण करने के लिए संगठित ऋणदाताओं की कुशलता की इस क्षेत्र को आवश्यकता नहीं रह जाएगी. यद्यपि पांच करोड़ गरीब परिवारों को वित्तीय सहायता दी जा चुकी है, लेकिन इसके बाद इनकी हालत और भी खराब हो गई है. इन्हें औसतन 20 से 24 प्रतिशत की भारी ब्याज दर से ऋण चुकाना पड़ता है.
अगर स्वयं सहायता समूह में गरीब से गरीब महिला को भी बकरी खरीदने के लिए ऋण लेना पड़ता है तो उस पर 24 प्रतिशत ब्याज वसूला जाता है. बताने की आवश्यकता नहीं कि इस धनराशि से वह आजीविका का साधन जुटाना चाहती है, जबकि एक टीवी, फ्रिज या स्कूटर खरीदने के लिए उसे ब्याजमुक्त ऋण आसानी से मिल सकता है. कुल मिलाकर अर्थशास्त्री हमें बताते हैं कि वह जितने अधिक उपभोक्ता उत्पाद खरीदेगी उतना ही सकल घरेलू उत्पाद बढ़ेगा.
इसके लिए अगर उसे भूखे सोना पड़ता है तो यह कोई बड़ा बलिदान नहीं है. देश की प्रगति के लिए इतना बलिदान तो किया ही जाना चाहिए. कौन कहता है कि सपने बेचना का ठेका केवल बालीवुड ने उठा रखा है!
(www.raviwar.com से देवेन्द्र शर्मा)

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कोई भी मूल्य एवं संस्कृति तब तक जीवित नहीं रह सकती जब तक वह आचरण में नहीं है.