20110628

NOIDA, उ.प्र. में भूमि अधि-ग्रहण पर सर्वोच्च न्यायालय की चेतावनी

कब देश की बिना पढ़ी लिखी गरीब जनता यह समझेगी कि शासक वर्ग उन्हें मात्र मत (vote) देने की मशीन समझता है और उनके मतों से पोषित होकर उनको ही भूल जाया करता है? निर्वाचित होने के उपरान्त धनी वर्ग की सेवा और पोषण ही उनका ध्येय बन जाता है.

स्वतंत्रता के पश्चात भारत में कृषि को उन्नत बनाने की बहुत सी योजनाये शुरू की गई. किन्तु पिछले कई वर्षों में हुए चहुमुखी विकास के नाम पर कृषि को किस तरह निचले पायदान पर धकेल दिया गया यह किसी से छुपा नहीं है. जैसे हमारे संत मनमोन सिंह जी कृषकों को कृषि छुडवाकर नौकरी देना चाह रहे हैं.

वैसे भी अब विकास का अर्थ 'बहुजन हिताय' न होकर 'धनिक हिताय' भर बचा है. विशेषाधिकारों के बल पर उच्च कोटि की कृषि योग्य भूमि को महानगरों में बदला जा रहा है तो कहीं कल- कारखानों, Multiplexes, Parks के नाम पर भूमि हथियाकर व्यापारिक लाभ के लिए प्रयोग किया जा रहा है. कहने के लिए कृषकों को भूमि का मूल्य चुकाया जा रहा है किन्तु हमारी इस सामजिक व्यवस्था में वो सब एक मजदूर बन कर रह जावेंगे... .. इस के जिम्मेदार होंगे धनी वर्ग के लोग और उनके इशारों पर ऐसी नीतियां बनाने वाले शासक.

धनी वर्ग धन का लालच देकर शासक वर्ग को जन सेवक से निजी सेवक बना कर अपने हित की योजनायें बनवाते रहते है... ... नीरा राडिया जैसे लोग ऐसे ही निजी सेवकों का काम करते हैं... और लाभ टाटा, बिड़ला Reliance को होता है... फल भोगते हैं आम लोग.

दुःख है कि सर्वोच्च प्राथमिकता वाले विषय पर बहस करने में हमें इतने वर्ष लग गए.

कल सर्वोच्च न्यायालय ने NOIDA में भूमि अधि-ग्रहण पर उ.प्र. शासन के को लताड़ लागते हुए कहा कि देश में नंदीग्राम जैसी और घटना नहीं होनी चाहिये. त्वरित धनोपार्जन की अभिलाषा से देश के विकास का मखौल उड़ाने की मानसिकता वाले व्यवसायी वर्ग एवं निम्नकोटि की नीतिगत अभिज्ञता प्रदर्शित करने वाले शासक वर्ग पर उचित प्रहार किया है.
----------------------------------------------------------------------------------------------- कोई भी मूल्य एवं संस्कृति तब तक जीवित नहीं रह सकती जब तक वह आचरण में नहीं है.

20110619

जन्मदिन पर राहुल गाँधी का भाषण: एक पूर्वानुमान

आज राहुल गाँधी का जन्मदिन है। पिछले साल ‘राहुल जन्मदिवस’ पूरे रूआब के साथ मना था। हमारे शहर वाराणसी में भी ‘केक’ कटे थे। अख़बार के कतरन बताते हैं कि 10-जनपथ पर जश्न का माहौल था। लेकिन इस साल स्थितियाँ पलटी मारी हुई दिख रही हैं। राहुल गाँधी मीडिया-पटल से लापता हैं। उन्हें जन्मदिन की बधाईयाँ देने वाले बेचैन हैं। आज के दिन यदि राहुल गाँधी जनता से मुखातिब हुए, तो वे क्या कुछ अपने भाषण में बोल सकते हैं? प्रस्तुत है एक पूर्वानुमान:

‘‘प्यारे देशवासियों, योगगुरु रामदेव अपने किए की सजा भुगत रहे हैं। उन जैसों का यही हश्र होना चाहिए। बाबा रामदेव की मंशा ग़लत थी। वह सत्याग्रह के नाम पर लोकतंत्र को बंधक बनाना चाहते थे। दिल्ली पुलिस ने समय रहते नहीं खदेड़ा होता, तो बाबा रामदेव संघ के साथ मिलीभगत कर पूरे कानून-तंत्र की धज्जियाँ उड़ाकर रख देते। संघ और भाजपा से उनके रिश्ते कैसे हैं? यह देश की जनता जान चुकी है। जनता जागरूक है। वह भारतीय राजनीतिज्ञों का नस-नस पहचानती है।

इस देश के लिए मेरी दादी और पूर्व प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी ने जान दिए हैं। मेरे पिता ने अपना बलिदान दिया है। मेरी माँ ने प्रधानमंत्री पद का लोभ नहीं किया। सिर्फ इसलिए कि वे जनता के लिए बनी हैं। कांग्रेस पार्टी अकेली ऐसी पार्टी है जो सही और गलत में भेद करना जानती है। कांग्रेस जैसी जनसेवी पार्टी को आज बुरा कहने वाले खुद कहाँ दूध के धुले हैं? लूटेरों और अपराधियों की पार्टी है बसपा जिसका जंगलराज है यूपी में। भट्टा-पारसौल का उदाहरण मेरे सामने है। अगर मैं और मेरी पार्टी के लोग समय से इस गाँव का दौरा नहीं किए होते; अपनी बात को प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के समक्ष नहीं रखते, तो शायद ही वहाँ घटित पुलिसिया जुल्म का भयावह चेहरा सामने आ पाता। शायद ही बड़े पैमाने पर लोगों के मारे जाने तथा ग्रामीण औरतों के साथ हुए दुर्व्यवहार की ख़बर प्रकट हो पाती।

बिहार में भले ही कांग्रेस को जनता ने वोट नहीं दिया हो लेकिन वहाँ की जनता ने कांग्रेस को नकारा नहीं है। कांग्रेस की साख आज भी बिहार में बेजोड़ है। अगली विधानसभा चुनाव में जनता हिसाब बराबर कर देगी। नितिश सरकार का कथित विकास का प्रोपोगेण्डा फेल होगा और प्रांतीय सत्ता में कांग्रेस बहुमत से काबिज होगी। बिहार में चल रहे भाजपा-जद(यू) गठबंधन को केन्द्र ने करोड़ों-करोड़ रुपयों का फंड भेजा है। नितिश सरकार अपने ग़िरबान में नहीं झाँकती है। विकास कार्य करने में वह खुद अक्षम है। ये पार्टियाँ अपने भीतर की बुराइयों से नहीं निपटना चाहती हैं। उल्टे कांग्रेस के ऊपर धावा बोलती हैं। यह जानते हुए कि कांग्रेस पार्टी देश की सबसे पुरानी पार्टी है। स्वाधीनता संग्राम में उसकी प्राथमिक भूमिका रही है। आजादी मिलने के बाद देश को औद्योगिक क्रांति, हरित क्रांति, श्वेत क्रांति से होते हुए संचार क्रांति के द्वार तक पहुँचाने वाली पार्टी कांग्रेस ही है। गौरवशाली परम्परा वाली इस पार्टी पर जनता को आज भी सबसे अधिक भरोसा है। मनमोहन सिंह जैसे ईमानदार छवि वाले नेता अन्य पार्टियों में शायद ही हों। भाजपा भी पाक-साफ नहीं है। बसपा, सपा, राजद, लोजपा, जद(यू) और वामदल कांग्रेस पार्टी से प्रतिस्पर्धा अवश्य करते हैं; लेकिन जनता हमारे साफ-सुथरी छवि के सादगीपसंद नेताओं को ही लायक समझती है।

तमाम आलोचनाओं, आरोपों और छींटाकशी के बावजूद कांग्रेस का कोई जोड़ नहीं है। आप ही सोचिए, गरीबों, मजदूरों, किसानों की पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अगर सही नहीं होती, तो जनता मुर्ख नहीं है जो उसे जनादेश सौंपती। उसके किए को सराहती और दुबारा-तिबारा संसद में पहुँचाने खातिर पूर्ण बहुमत प्रदान करती। भाइयों, यूपी विधानसभा चुनाव में अगली बारी कांग्रेसियों की है। हमारी पार्टी को प्रचार की जरूरत नहीं है। हमें खुशी है कि प्रांतीय मोर्चा संभालने वाली प्रखर वक्ता और बुद्धिजीवी नेता रीता बहुगुणा जोशी जी हमारे साथ है। जनता उनकी आत्मीयता भरे मुसकान की कायल है। वे जमीन से जुड़ी हुई नेता हैं। उनके नेतृत्व में मिशन-2012 में कांग्रेस का प्रदेश की सत्ता पर सौ-फीसदी काबिज़ होना तय है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि कांग्रेस ने जो भी काम किए हैं; सब के सब जमीन से जुड़े हैं। कांग्रेस पार्टी में जनता की अगाध निष्ठा है। क्योंकि कांग्रेस पार्टी आमआदमी की पार्टी है। उनके दुख-दर्द में हमेशा साथ रहने वाली पार्टी है।

जिस दिन योगगुरु रामदेव ने दिल्ली में कुहराम मचाया मैं हतप्रभ रह गया। एक सामान्य मसले को जिस ढंग से गंभीर और भीषण मामला बनाने की षड़यंत्र रची गई। जनता की पार्टी को बदनाम करने की साजिश हुई। काले धन को ले कर भगवा पोशाक वालों ने ऐसा बवेला मचाया कि दिल्ली के सभ्य जनता को भारी कोफ्त हुई। जिस देश की राजधानी में सबकुछ शांतिपूर्ण तरीके से होता है। लोग रोजमर्रा की जिन्दगी में सुकून की सांसे लेते हैं। उस वातावरण को बाबा रामदेव के भीड़बाजों ने विषाक्त कर दिया। मेहनतकश दिल्लीवासियों की नींद हराम कर दी। यह तो अच्छा हुआ कि ‘हेल्दी दिल्ली’ का स्वप्न देखने वाली दिल्ली सरकार ने समय रहते ठोस कार्रवाई की। नौटंकीबाज बाबा रामदेव को रामलीला मैदान से बाहर निकाल फेंका। कई दिनों तक बाबा के ‘मीडिया सेटरों’ ने कांग्रेस पार्टी को लक्ष्य कर दिन-दिन भर जनभावना भड़काने वाले कथा बाँचें। इलेक्ट्रानिक माध्यम पर भौंडे ढंग से दिल्ली पुलिस की छवि खराब करने वाली ख़बरें प्रकाशित की जो कि अपने दायरे में एकदम सही और उपयुक्त कार्रवाई करने का ज़ज़्बा दिखाया है।

इस पूरे घटनाक्रम में देश बिल्कुल शांत रहा। कहीं कोई जुलूस-प्रदर्शन नहीं हुए। जनता में जनाक्रोश भी नहीं दिखा। दरअसल, विपक्षी पार्टियाँ कांग्रेस की सफेदी से डरती है। वे जानती हैं कि काला धन जैसा कोई मामला ही नहीं है। जिन लोगों के पैसे स्विस बैंकों में जमा है; उसकी छानबीन जारी है। कांग्रेस अगर भ्रष्ट होती, तो सुरेश कलमाड़ी, ए. राजा और कनिमोझी जैसे भ्रष्टाचार का आरोप झेलते लोगों को जेल के सलाखों के पीछे नहीं डालती। कांग्रेस देश में बेहतर कल का निर्माण करना चाहती है। हर व्यक्ति को रोजगार देने को दृढ़संकल्प है। भूख, गरीबी, बीमारी, अकाल, सूखा, बाढ़, महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर वह ठोस प्रयास करने में जुटी है। ऐसी नेकनाम पार्टी को बदनाम करने पर तुली पार्टियों को जनता अवश्य सबक सिखाएगी। यह निश्चित है।

भाइयों, दिल्ली पुलिस की बहादुरी को दाद देनी होगी जिसने चंद घंटों में रामलीला मैदान से उन अराजक तत्त्वों को बाहर खदेड़ दिया जिसका लीडर खुले मंच से सशस्त्र सेना बनाने की बात करता है। कांग्रेस पार्टी ऐसी नहीं है। वह नीड़ का निर्माण करना चाहती है। सभी वर्ग के लोगों का उत्थान। कांग्रेस जाति तोड़ो अभियान का समर्थक है। धर्म और संप्रदाय के नाम पर फसाद करने वाली पार्टी नहीं है कांग्रेस। हिन्दुस्तान की जनता को मालूम है कि बाकी पार्टियाँ झूठी हैं, मक्कार और लंपट है। इसीलिए कांग्रेस ही सत्ता का स्थायी हकदार है। कांग्रेस देसी जनसमर्थन वाली पार्टी है। इसके प्रायोजक पूँजीपति नहीं है। औधोगिक घरानों से चंदा-उगाही करना इस पार्टी को नहीं आता है। तभी तो, कांग्रेस अपने देश की जनपक्षधर हाथों पर भरोसा करते हुए शासन-व्यवस्था में बनी रहती है। यह छुपा तथ्य नहीं है कि कांग्रेस में नाजायज़ पैसों की आमद-आवक शून्य है। अधिकांश सांसद जमीनी सरोकार से जुड़े जमीनी लोग हैं। उनकी अर्जित संपति जनता का विश्वास है। हमारी पार्टी जनता के बीच काम करते हुए दिखना चाहती है। वह करोड़पति सांसदों से लदी-फदी पार्टी नहीं है। कांग्रेस महात्मा गाँधी की संतान है जिनका फ़लसफ़ा था-‘सादा जीवन, उच्च विचार।’ हम नाजायज ढंग से बटोरे गए सम्पति के खिलाफ हैं। ऐय्याशी हमारा जन-धर्म नहीं है। कांग्रेस पार्टी का एजेण्डा वैचारिक स्तर पर खुला है। हम ‘गाँधी जी के जंतर’ को ध्येय-वाक्य समझते हैं।

वहीं अन्य पार्टियों को देखिए, वे तो इसी में आकंठ डूबी हैं। उनका एक ही मकसद; येन-केन-प्रकारेण पैसा बनाना है। चाहे देश जाए जहन्नुम में। जबकि कांग्रेस हिन्दुस्तान को जन्नत बनाने का स्वप्न देखती है। जहाँ-जहाँ केन्द्र-प्रान्त का कांग्रेसी सह-अस्तित्व है; वहाँ विकास और समृद्धि का रौनक देख लीजिए। अंतर से साफ पता चल जाएगा कि कांग्रेस हिन्दुस्तान का सूरत बदलने में कितने जोर-शोर से जुटी है। कांग्रेस पार्टी चाहती है कि भारतीय राजनीति में कम लोग रहे, लेकिन अच्छे लोग रहें। सच्चे और ईमानदार लोग रहें। समझदार और युवा लोग रहंे। दरअसल, कांग्रेस समता की मूरत है। भाईचारा और बंधुत्व उसके रग-रग में प्रवाहित हैं। कांग्रेस शुरू से गंगा-यमुना तहजीब की हिमायती है। गरीबों पर जुल्म ढाने की हिमाकत देश की सभी छोटी-बड़ी पार्टियाँ करती हैं; अपवाद सिर्फ एक कांग्रेस है। कांग्रेसी कार्यकर्ता की ईमानदारी देख लोग दंग रह जाते हैं। आज भी सादगी इन पार्टी कैडरों के आचरण में कूट-कूट कर भरी है। लोग अपनापन के लहजे में कांग्रेस से अपने निकट सम्बन्धों का हवाला देते हैं। कांग्रेस इकलौती ऐसी पार्टी है जिसके आलाकमान से 10-जनपथ में मिलना आसान है। सोनिया जी त्याग की प्रतिमूर्ति हैं। वे धैर्य से लोगों की पीड़ा और व्यथा सुनती हैं। उनके लिए तत्काल उपाय करती हैं। पिछले कई वर्षों से मनमोहन सिंह पर आरोप-दर-आरोप लगते रहे हैं। जबकि उन्होंने आज देश को क्या नहीं दिया है?

हम अपने शहर में मॉल और मल्टीप्लेक्स देख रहे हैं। सड़कों का नवीनीकरण और चौड़ीकरण होते देख रहे हैं। विद्युत की निरंतरता बनी हुई है सो अलग। अब गाँव के लोग भी टेलीविजन पर ‘वर्ल्ड कप’ और ‘आईपीएल’ देख रहे हैं। उनके लिए नरेगा-मनरेगा जैसे विकल्प हैं जो उन्हें किसी कीमत पर भूखों नहीं मरने दे सकते हैं। बच्चों की मुफ्त शिक्षा के अतिरिक्त उत्तम खाने का प्रबंध है। स्त्रियों में जागृति के लिए कांग्रेस ने कई दिलचस्प कार्यक्रम शुरू किए हैं। पंचवर्षीय योजनाओं में भारत हमेशा लक्ष्य के करीब पहुँचने में सफल रहा है। कांग्रेस सादगीपसंद राजनीतिज्ञों को टिकट देता है. गुंडा, मवाली, अपराधी और हत्या के आरोपी कांग्रेसी दल में शामिल नहीं है। तमाम राजनीतिक उठापटक के बावजूद जनता कांग्रेस को ही चुनेगी। काला धन के मसले पर हवाई किला बाँधने वाली भाजपा और बसपा जैसी पार्टियों ने हमारे देश की धन-संपदा को बड़ी बेदर्दी से लूटा है। इन पार्टियों ने जल-जंगल और जमीन को विदेशी बाज़ार के हवाले कर दिया है। देश को गुलाम बनाने की संस्कृति भाजपा और बसपा ने ही सिरजा है। सपा भी सार्गिद है, लेकिन उसकी हैसियत उस जोड़ की नहीं है कि वह चुनावों में कोई मजबूत तोड़ पैदा कर सके। ऐसे में कांग्रेस ही इन साम्प्रदायिक ताकतों और बुर्जुआ पार्टियों के मुख़ालफत में सही विकल्प हो सकती है। कांग्रेस को यदि देश के अल्पसंख्यक बिन मांगे वोट देते हैं, तो सिर्फ इन वजहों से कि कांग्रेस अपनी विचारधारा में सर्वाधिक निरपेक्ष और दृष्टिसम्पन्न पार्टी है.

अतः बाबा रामदेव के खिलाफ की गई कार्रवाई सही है। मैं चुप था, क्योंकि देश की जनता जान रही थी कि यह सारा मामला प्रायोजित है। बाबा रामदेव के अनुयायियों के माध्यम से देश की सबसे विश्वसनीय पार्टी को बदनाम करने की साजिश है। यह वह तरीका है जिससे देश में हो रहे अच्छे कामों से ध्यान भटकाया जा सके। जनता के भीतर फैल रहे संतोष और प्रसन्नता को झुठलाया जा सके। लेकिन यह कहने की बात नहीं है कि देश की जनता कांग्रेस को छोड़कर किसी दूसरे पार्टी के बारे में बात करना तो दूर कल्पना भी नहीं करती है। कांग्रेस को यह भली-भाँति पता है कि जिस तरह रामलीला मैदान में दिल्ली पुलिस ने बाबा रामदेव को उनकी औकात बता दी है; वैसे ही अगर जनता चाह गई तो कांग्रेस किला भी ढूह में बदल जाएगी। लेकिन ऐसा जनता करना क्यों चाहेगी? यह प्रश्न अतिमहत्त्वपूर्ण है।’’
(राजीव रंजन प्रसाद)
----------------------------------------------------------------------------------------------- कोई भी मूल्य एवं संस्कृति तब तक जीवित नहीं रह सकती जब तक वह आचरण में नहीं है.

Things to do after u install Ubuntu

1. First thing first:
 To temporarily configure an IP address, you can use the ifconfig command in the following manner. Just modify the IP address and subnet mask to match your network requirements:

sudo ifconfig eth0 10.0.0.100 netmask 255.255.255.0

To configure a default gateway, you can use the route command in the following manner. Modify the default gateway address to match your network requirements:
 
sudo route add default gw 10.0.0.1 eth0

To verify your IP address configuration of eth0, and default gateway configuration, you can use the ifconfig and route command respectively in the following manner:
ifconfig eth0
route -n

If you require DNS for your temporary network configuration, you can add DNS server IP addresses in the file /etc/resolv.conf. The example below shows how to enter two DNS servers to /etc/resolv.conf, which should be changed to servers appropriate for your network. A more lengthy description of DNS client configuration is in a following section

nameserver 8.8.8.8
nameserver 8.8.4.4

If you no longer need this configuration and wish to purge all IP configuration from an interface, you can use the ip command with the flush option as shown below
ip addr flush eth0

To configure your server to use DHCP for dynamic address assignment, add the dhcp method to the inet address family statement for the appropriate interface in the file /etc/network/interfaces. The example below assumes you are configuring your first Ethernet interface identified as eth0
auto eth0
iface eth0 inet dhcp

By adding an interface configuration as shown above, you can manually enable the interface through the ifup command which initiates the DHCP process via dhclient.
sudo ifup eth0

To manually disable the interface, you can use the ifdown command, which in turn will initiate the DHCP release process and shut down the interface
sudo ifdown eth0


To configure your system to use a static IP address assignment, add the static method to the inet address family statement for the appropriate interface in the file /etc/network/interfaces. The example below assumes you are configuring your first Ethernet interface identified as eth0. Change the address, netmask, and gateway values to meet the requirements of your network.
auto eth0
iface eth0 inet static
address 10.0.0.100
netmask 255.255.255.0
gateway 10.0.0.1

By adding an interface configuration as shown above, you can manually enable the interface through the ifup command.
sudo ifup eth0

To manually disable the interface, you can use the ifdown command.
sudo ifdown eth0

Loopback Interface

The loopback interface is identified by the system as lo and has a default IP address of 127.0.0.1. It can be viewed using the ifconfig command.
ifconfig lo
lo        Link encap:Local Loopback  
          inet addr:127.0.0.1  Mask:255.0.0.0
          inet6 addr: ::1/128 Scope:Host
          UP LOOPBACK RUNNING  MTU:16436  Metric:1
          RX packets:2718 errors:0 dropped:0 overruns:0 frame:0
          TX packets:2718 errors:0 dropped:0 overruns:0 carrier:0
          collisions:0 txqueuelen:0 
          RX bytes:183308 (183.3 KB)  TX bytes:183308 (183.3 KB)
By default, there should be two lines in /etc/network/interfaces responsible for automatically configuring your loopback interface. It is recommended that you keep the default settings unless you have a specific purpose for changing them. An example of the two default lines are shown below.
auto lo
iface lo inet loopback

2. To update and upgrade:
sudo gedit /etc/apt/apt.conf/
In the same file, write some lines as following:
Acquire::http::Proxy "http://usrname:password@x.x.x.x:80";
then save it and close, go for update the system list:
   sudo apt-get update

This is for one step upgrade/version upgrade
:~$ sudo apt update && sudo apt-get update && sudo apt-get upgrade && sudo apt dist-upgrade -y && sudo apt-get install update-manager-core && sudo apt autoremove && sudo do-release-upgrade -d

3. sudo apt-get install ubuntu-restricted-extras
    sudo apt-get install default-jre

4. sudo apt-get install appname --fix-missing

flash player, Gnash (Linux alternative for shockwave) skype, vlc, mplayer, gimp, cheese, miro, okular, remmina, flareGet download manager, rar,
sudo apt-get install browser-plugin-gnash
One can get the flash player from: http://archive.canonical.com/pool/partner/a/adobe-flashplugin/

5. install file foo
   sudo dpkg -i foo.deb

If there is any dependency issues, fix them by:
sudo apt-get install -f

6. sudo apt-get install texlive

   sudo apt-get install kile

 
7. list installed packages
   dpkg -l

8. To upgrade individual software called foo type command:
    sudo apt-get install foo

9. search available packages for foo
   apt-cache search foo

or find here: https://ubuntu.pkgs.org/

10. remove package foo
    sudo apt-get remove foo
or
   sudo dpkg --force-all -r foo


11. Check if u have a 32/64 bit Ubuntu
      uname -a

12. To copy and paste
   sudo cp -a /path/to/folderWITHOUTASLASHATTHEEND! /where/you/want/folder/to/go

13. Modify the grub2
https://help.ubuntu.com/8.04/switching/dualboot-custom.html

14. Grub2 Tutorial:
      http://www.dedoimedo.com/computers/grub-2.html

15. Install CD/DVD burner: GnomeBaker
      https://help.ubuntu.com/community/GnomeBaker

16. Install HP printer:
      http://hplipopensource.com/hplip-web/index.html

17. Install from .tar.gz file:

tar -xzf archive-name.tar.gz
cd archive-name
./configure
make
sudo make install

18. Upgrade to the new version

Make sure your current version isn't too old to upgrade through packages. If it IS too old (for example, if you're using a non-LTS version that is a couple years old, then you'll need to grab an ISO and upgrade via CD/DVD. Best to not do this over SSH in case something goes wrong, but the upgrade process will open a non-standard SSH port for you (it alerts you to this) if you don't want to be or can't be by the machine.
Step by step:
Update and upgrade your apt-get modules:
sudo apt-get update
sudo apt-get upgrade
sudo apt-get dist-upgrade

Then begin the upgrade process:
sudo apt-get install update-manager-core
sudo do-release-upgrade

In case upgrade is getting cancelled and the current version is quite old then you might need to follow:
http://askubuntu.com/questions/501976/unable-to-upgrade-from-13-04-to-14-04

Also: https://repogen.simplylinux.ch/ 

https://myotragusbalearicus.wordpress.com/2014/12/02/ubuntu-recovery-mode-with-network-and-read-write-filesystem/

*Lubuntu/Documentation/UpgradeToLubuntu: Click here

19. Get rid of “Sorry, Ubuntu 13.10 has experienced internal error”
Its a legacy now. It started with Ubuntu 12.04 and continue till date. Though totally harmless, this crash report is extremely annoying. You can disable the apport by editing the following file:
gksu gedit /etc/default/apport
Now, in this file look for the line
# sudo service apport start force_start=1 enabled=1
Change the enabled=1 to enabled=0. For more detail steps, follow this article on how to get rid of the error permanently.

20. Alternatives:
Octave is for MATLAB

21. Ubuntu Server
http://www.htpcbeginner.com/lightweight-desktop-environment-for-ubuntu-server/

http://www.ubuntugeek.com/how-to-install-gui-on-ubuntu-12-04-precise-server.html

22. You can add a PPA location with the command
sudo add-apt-repository ppa:
For example sudo add-apt-repository ppa:gnome-desktop 
add-apt-repository 'deb http://packages.linuxmint.com/ julia main' 

23. Printers
to view outstanding print jobs:
lpstat -o
to cancel ALL jobs:
cancel -a {printer}

24. "lscpu" gives the info about CPU.



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20110618

आधुनिक भारत की राबर्ट क्लाइव: सोनिया गांधी

सोनिया माइनो गांधी. भारत की सबसे ताकतवर महिला शासक जिसके प्रत्यक्ष हाथ में सत्ता भले ही न हो लेकिन जो एक सत्ताधारी पार्टी की सर्वेसर्वा हैं. जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी लंबे अरसे से सोनिया गांधी के बारे में ऐसे आश्चर्यजनक बयान देते रहे हैं जिसपर सहसा यकीन करना मुश्किल होगा. लेकिन अब जैसे जैसे समय बीत रहा है सोनिया गांधी का सच और सुब्रमण्यम स्वामी के बयान की दूरियां घटती दिखाई दे रही हैं. सोनिया गांधी के बारे में खुद सुब्रमण्यम स्वामी का यह लेख-
तीन झूठ:
कांग्रेस पार्टी और खुद सोनिया गांधी अपनी पृष्ठभूमि के बारे में जो बताते हैं, वो तीन झूठों पर टिका हुआ है। पहला ये है कि उनका असली नाम अंतोनिया है न की सोनिया। ये बात इटली के राजदूत ने नई दिल्ली में 27 अप्रैल 1973 को लिखे अपने एक पत्र में जाहिर की थी। ये पत्र उन्होंने गृह मंत्रालय को लिखा था, जिसे कभी सार्वजनिक नहीं किया गया। सोनिया का असली नाम अंतोनिया ही है, जो उनके जन्म प्रमाण पत्र के अनुसार एकदम सही है।

सोनिया से जुड़ा दूसरा झूठ है उनके पिता का नाम। अपने पिता का नाम स्टेफनो मैनो बताया था। वो दूसरे विश्व युद्ध के समय रूस में युद्ध बंदी थे। स्टेफनो नाजी आर्मी के वालिंटियर सदस्य थे। बहुत ढेर सारे इतालवी फासिस्टों ने ऐसा ही किया था। सोनिया दरअसल इतालवी नहीं बल्कि रूसी नाम है। सोनिया के पिता रूसी जेलों में दो साल बिताने के बाद रूस समर्थक हो गये थे। अमेरिकी सेनाओं ने इटली में सभी फासिस्टों की संपत्ति को तहस-नहस कर दिया था। सोनिया ओरबासानो में पैदा नहीं हुईं, जैसा की उनके बायोडाटा में दावा किया गया है। इस बायोडाटा को उन्होंने संसद में सासंद बनने के समय पर पेश किया था, सही बात ये है कि उनका जन्म लुसियाना में हुआ। शायद वह इस जगह को इसलिए छिपाने की कोशिश करती हैं ताकि उनके पिता के नाजी और मुसोलिनी संपर्कों का पता नहीं चल पाये और साथ ही ये भी उनके परिवार के संपर्क इटली के भूमिगत हो चुके नाजी फासिस्टों से युद्ध समाप्त होने तक बने रहे। लुसियाना नाजी फासिस्ट नेटवर्क का मुख्यालय था, ये इटली-स्विस सीमा पर था। इस मायनेहीन झूठ का और कोई मतलब नहीं हो सकता।

तीसरा सोनिया गांधी ने हाईस्कूल से आगे की पढ़ाई कभी की ही नहीं , लेकिन रायबरेली से चुनाव लड़ने के दौरान उन्होंने अपने चुनाव नामांकन पत्र में उन्होंने ये झूठा हलफनामा दायर किया कि वो अंग्रेजी में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से डिप्लोमाधारी हैं। ये हलफनामा उन्होंने 2004 के लोकसभा चुनावों के दौरान रायबरेली में रिटर्निंग ऑफिसर के सम्मुख पेश किया था। इससे पहले 1989 में लोकसभा में अपने बायोग्राफिकल में भी उन्होंने अपने हस्ताक्षर के साथ यही बात लोकसभा के सचिवालय के सम्मुख भी पेश की थी , जो की गलत दावा था। बाद में लोकसभा स्पीकर को लिखे पत्र में उन्होंने इसे मानते हुए इसे टाइपिंग की गलती बताया। सही बात ये है कि श्रीमती सोनिया गांधी ने कभी किसी कालेज में पढाई की ही नहीं। वह पढ़ाई के लिए गिवानो के कैथोलिक नन्स द्वारा संचालित स्कूल मारिया आसीलेट्रिस गईं , जो उनके कस्बे ओरबासानों से 15 किलोमीटर दूर था। उन दिनों गरीबी के चलते इटली की लड़कियां इन मिशनरीज में जाती थीं और फिर किशोरवय में ब्रिटेन ताकि वहां वो कोई छोटी-मोटी नौकरी कर सकें। मैनो उन दिनों गरीब थे। सोनिया के पिता और माता की हैसियत बेहद मामूली थी और अब वो दो बिलियन पाउंड की अथाह संपत्ति के मालिक हैं। इस तरह सोनिया ने लोकसभा और हलफनामे के जरिए गलत जानकारी देकर आपराधिक काम किया है , जिसके तहत न केवल उन पर अपराध का मुकदमा चलाया जा सकता है बल्कि वो सांसद की सदस्यता से भी वंचित की जा सकती हैं। ये सुप्रीम कोर्ट की उस फैसले की भावना का भी उल्लंघन है कि सभी उम्मीदवारों को हलफनामे के जरिए अपनी सही पढ़ाई-लिखाई से संबंधित योग्यता को पेश करना जरूरी है। इस तरह ये सोनिया गांधी के तीन झूठ हैं, जो उन्होंने छिपाने की कोशिश की। कहीं ऐसा तो नहीं कि कतिपय कारणों से भारतीयों को बेवकूफ बनाने के लिए उन्होंने ये सब किया। इन सबके पीछे उनके उद्देश्य कुछ अलग थे। अब हमें उनके बारे में और कुछ भी जानने की जरूरत है।

सोनिया का भारत में पदार्पण:
सोनिया गांधी ने इतनी इंग्लिश सीख ली थी कि वो कैम्ब्रिज टाउन के यूनिवर्सिटी रेस्टोरेंट में वैट्रेस बन गईं। वो राजीव गांधी से पहली बार तब मिलीं जब वो 1965 में रेस्टोरेंट में आये। राजीव यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट थे , लेकिन वो लंबे समय तक अपने पढ़ाई के साथ तालमेल नहीं बिठा पाये इसलिए उन्हें 1966 में लंदन भेज दिया गया , जहां उनका दाखिला इंपीरियल कालेज ऑफ इंजीनियरिंग में हुआ। सोनिया भी लंदन चली आईं। मेरी सूचना के अनुसार उन्हें लाहौर के एक व्यवसायी सलमान तासिर के आउटफिट में नौकरी मिल गई। तासीर की एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट कंपनी का मुख्यालय दुबई में था लेकिन वो अपना ज्यादा समय लंदन में बिताते थे। आईएसआई से जुडे होने के लिए उनकी ये प्रोफाइल जरूरी थी। स्वाभावित तौर पर सोनिया इस नौकरी से इतना पैसा कमा लेती थीं कि राजीव को लोन फंड कर सकें। राजीव मां इंदिरा गांधी द्वारा भारत से भेजे गये पैसों से कहीं ज्यादा पैसे खर्च देते थे। इंदिरा ने राजीव की इस आदत पर मेरे सामने भी 1965 में तब मेरे सामने भी गुस्सा जाहिर किया था जब मैं हार्वर्ड में इकोनामिक्स का प्रोफेसर था। श्रीमती इंदिरा गांधी ने मुझे ब्रेंनेडिस यूनिवर्सिटी के गेस्ट हाउस में , जहां वो ठहरी थीं , व्यक्तिगत तौर पर चाय के लिए आमंत्रित किया। पीएन लेखी द्वारा दिल्ली हाईकोर्ट में पेश किये गये राजीव के छोटे भाई संजय को लिखे गये पत्र में साफ तौर पर संकेत दिया गया है कि वह वित्तीय तौर पर सोनिया के काफी कर्जदार हो चुके थे और उन्होंने संजय से अनुरोध किया था , जो उन दिनों खुद ब्रिटेन में थे और खासा पैसा उड़ा रहे थे और कर्ज में डूबे हुए थे। उन दिनों सोनिया के मित्रों में केवल राजीव गांधी ही नहीं थे बल्कि माधवराव सिंधिया भी थे। सिंधिया और एक स्टीगलर नाम का जर्मन युवक भी सोनिया के अच्छे मित्रों में थे। माधवराव की सोनिया से दोस्ती राजीव की सोनिया से शादी के बाद भी जारी रही। 1972 में माधवराव आईआईटी दिल्ली के मुख्य गेट के पास एक एक्सीडेंट के शिकार हुए और उसमें उन्हें बुरी तरह चोटें आईं , ये रात दो बजे की बात है , उसी समय आईआईटी का एक छात्र बाहर था। उसने उन्हें कार से निकाल कर ऑटोरिक्शा में बिठाया और साथ में घायल सोनिया को श्रीमती इंदिरा गांधी के आवास पर भेजा जबकि माधवराव सिंधिया का पैर टूट चुका था और उन्हें इलाज की दरकार थी। दिल्ली पुलिस ने उन्हें हॉस्पिटल तक पहुंचाया। दिल्ली पुलिस वहां तब पहुंची जब सोनिया वहां से जा चुकी थीं। बाद के सालों में माधवराव सिंधिया व्यक्तिगत तौर पर सोनिया के बड़े आलोचक बन गये थे और उन्होंने अपने कुछ नजदीकी मित्रों से अपनी आशंकाओं के बारे में भी बताया था। कितना दुर्भाग्य है कि वो 2001 में एक विमान हादसे में मारे गये। मणिशंकर अय्यर और शीला दीक्षित भी उसी विमान से जाने वाले थे लेकिन उन्हें आखिरी क्षणों में फ्लाइट से न जाने को कहा गया। वो हालात भी विवादों से भरे हैं जब राजीव ने ओरबासानो के चर्च में सोनिया से शादी की थी , लेकिन ये प्राइवेट मसला है , इसका जिक्र करना ठीक नहीं होगा। इंदिरा गांधी शुरू में इस विवाह के सख्त खिलाफ थीं, उसके कुछ कारण भी थे जो उन्हें बताये जा चुके थे। वो इस शादी को हिन्दू रीतिरिवाजों से दिल्ली में पंजीकृत कराने की सहमति तब दी जब सोवियत समर्थक टी एन कौल ने इसके लिए उन्हें कंविंस किया , उन्होंने इंदिरा जी से कहा था कि ये शादी भारत-सोवियत दोस्ती के वृहद इंटरेस्ट में बेहतर कदम साबित हो सकती है। कौल ने भी तभी ऐसा किया जब सोवियत संघ ने उनसे ऐसा करने को कहा।

सोनिया के केजीबी कनेक्शन:
बताया जाता है कि सोनिया के पिता के सोवियत समर्थक होने के बाद से सोवियत संघ का संरक्षण सोनिया और उनके परिवार को मिलता रहा। जब एक प्रधानमंत्री का पुत्र लंदन में एक लड़की के साथ डेटिंग कर रहा था , केजीबी जो भारत और सोवियत रिश्तों की खासा परवाह करती थी , ने अपनी नजर इस पर लगा दी , ये स्वाभाविक भी था , तब उन्हें पता लगा कि ये तो स्टेफनो की बेटी है , जो उनका इटली का पुराना विश्वस्त सूत्र है। इस तरह केजीबी ने इस शादी को हरी झंडी दे दी। इससे पता चलता है कि केजीबी श्रीमती इंदिरा गांधी के घर में कितने अंदर तक घुसा हुआ था। राजीव और सोनिया के रिश्ते सोवियत संघ के हित में भी थे , इसलिए उन्होंने इस पर काम भी किया। राजीव की शादी के बाद मैनो परिवार को सोवियत रिश्तों से खासा फायदा भी हुआ। भारत के साथ सभी तरह सोवियत सौदों , जिसमें रक्षा सौदे भी शामिल थे , से उन्हें घूस के रूप में मोटी रकम मिलती रही। एक प्रतिष्ठित स्विस मैगजीन स्विट्जर इलेस्ट्रेटेड के अनुसार राजीव गांधी के स्विस बैंक अकाउंट में दो बिलियन पाउंड जमा थे , जो बाद में सोनिया के नाम हो गये। डॉ. येवगेनी अलबैट (पीएचडी , हार्वर्ड) जाने माने रूसी स्कॉलर और जर्नलिस्ट हैं और वो अगस्त 1981 में राष्ट्रपति येल्तिसिन द्वारा बनाये गये केजीबी कमीशन के सद्स्यों में भी थीं। उन्होंने तमाम केजीबी की गोपनीय फाइलें देखीं , जिसमें सौदों से संबंधित फाइलें भी थीं। उन्होंने अपनी किताब द स्टेट विदइन स्टेट – केजीबी इन द सोवियत यूनियन में उन्होंने इस तरह की गोपनीय बातों के रिफरेंस नंबर तक दे दिये हैं , जिसे किसी भी भारतीय सरकार द्वारा क्रेमलिन से औपचारिक अनुरोध पर देखा जा सकता है। रूसी सरकार की 1982 में अल्बैटस से मीडिया के सामने ये सब जाहिर करने पर भिङत भी हुई। उनकी बातों की सत्यता की पुष्टि रूस के आधिकारिक प्रवक्ता ने भी की। (ये हिन्दू 1982 में प्रकाशित हुई थी)। प्रवक्ता ने इन वित्तीय भुगतानों की पैरवी करते हुए कहा था कि सोवियत हितों की दृष्टि से ये जरूरी थे। इन भुगतानों में कुछ हिस्सा मैनो परिवार के पास गया , जिससे उन्होंने कांग्रेस पार्टी की चुनावों में भी फंडिंग की। 1981 में जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तो चीजें श्रीमती सोनिया गांधी के लिए बदल गईं। उनका संरक्षक देश 16 देशों में बंट गया। अब रूस वित्तीय रूप से खोखला हो चुका था और अव्यवस्थाएं अलग थीं। इसलिए श्रीमती सोनिया गांधी ने अपनी निष्ठाएं बदल लीं और किसी और कम्युनिस्ट देश के करीब हो गईं , जो रूस का विरोधी है। रूस के मौजूदा प्रधानमंत्री और इससे पहले वहां के राष्ट्रपति रहे पुतिन एक जमाने में केजीबी के बड़े अधिकारी थे। जब डा. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे थे तो रूस ने अपने करियर डिप्लोमेट राजदूत को नई दिल्ली से वापस बुला लिया और तुरंत उसके पद पर नये राजदूत को तैनात किया , जो नई दिल्ली में 1960 के दशक में केजीबी का स्टेशन चीफ हुआ करता था। इस मामले में डॉ. अल्बैट्स का रहस्योदघाटन समझ में आता है कि नया राजदूत सोनिया के केजीबी के संपर्कों के बारे में बेहतर तरीके से जानता था। वो सोनिया से स्थानीय संपर्क का काम कर सकता था। नई सरकार सोनिया के इशारों पर ही चलती है और उनके जरिए आने वाली रूसी मांगों को अनदेखा भी नहीं कर सकती। क्या इससे ये नहीं लगता कि ये भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरनाक भी हो सकता है। वर्ष 2001 में मैंने दिल्ली में एक रिट याचिका दायर की , जिसमें केजीबी डाक्यूमेंट्स की फोटोकापियां भी थीं और इसमें मैंने सीबीआई जांच की मांग की थी लेकिन वाजपेई सरकार ने इसे खारिज कर दिया। इससे पहले सीबीआई महकमे को देखने वाली गृह राज्य मंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया ने मेरे 3 मार्च 2001 के पत्र पर सीबीआई जांच का आदेश भी दे दिया था लेकिन इस मामले पर सोनिया और उनकी पार्टी ने संसद की कार्रवाई रोक दी। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेई ने वसुधरा की जांच के आदेश को खारिज कर दिया। मई 2002 में दिल्ली हाईकोर्ट ने एक दिशा निर्देश जारी किया कि वो रूस से मालूम करे कि सत्यता क्या है , रुसियों ने ऐसी किसी पूछताछ का कोई जवाब नहीं दिया लेकिन सवाल ये है कि किसने सीबीआई को इस मामले पर एफआईआर दर्ज करने से मना कर दिया था। वाजपेई सरकार ने , लेकिन क्यों ? इसकी भी एक कहानी है। अब सोनिया ड्राइविंग सीट पर हैं और सीबीआई की स्वायत्ता लगभग खत्म सी हो चुकी है.

सोनिया और भारत के कानूनों का हनन:
सोनिया के राजीव से शादी के बाद वह और उनकी इतालवी परिवार को उनके दोस्त और स्नैम प्रोगैती के नई दिल्ली स्थित प्रतिनिधि आटोवियो क्वात्रोची से मदद मिली। देखते ही देखते मैनो परिवार इटली में गरीबी से उठकर बिलियोनायर हो गया। ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं था जिसे छोड़ा गया।
19 नवंबर 1964 को नये सांसद के तौर पर मैंने प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी से संसद में पूछा क्या उनकी बहू पब्लिक सेक्टर की इंश्योरेंस के लिए इंश्योरेंस एजेंट का काम करती है (ओरिएंट फायर एंड इंश्योरेंस) और वो भी प्रधानमंत्री हाउस के पते पर और उसके जरिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके पीएमओ के अधिकारियों का इंश्योरेंस करती हैं। जबकि वो अभी इतालवी नागरिक ही हैं (ये फेरा के उल्लंघन का मामला भी था)। संसद में हंगामा हो गया। कुछ दिनों बाद एक लिखित जवाब में उन्होंने इसे स्वीकार किया और कहा हां ऐसा हुआ था और ऐसा गलती से हुआ था लेकिन अब सोनिया गांधी ने इंश्योरेंस कंपनी से इस्तीफा दे दिया है।
जनवरी 1970 में श्रीमती इंदिरा गांधी फिर से सत्ता में लौटीं और सोनिया ने पहला काम किया और ये था खुद को वोटर लिस्ट में शामिल कराने का। ये नियमों और कानूनों का सरासर उल्लंघन था। इस आधार पर उनका वीसा भी रद्द किया जा सकता था तब तक वो इतालवी नागरिक के रूप में कागजों में दर्ज थीं। जब मीडिया ने इस पर हल्ला मचाया तो मुख्य निर्वाचक अधिकारी ने उनका नाम 1972 में डिलीट कर दिया। लेकिन जनवरी 1973 में उन्होंने फिर से खुद को एक वोटर के रूप में दर्ज कराया जबकि वो अभी भी विदेशी ही थीं और उन्होंने पहली बार भारतीय नागरिकता के लिए अप्रैल 1973 में आवेदन किया था।
सोनिया गांधी आधुनिक रॉबर्ट क्लाइव:
मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि सोनिया गांधी भारतीय कानूनों का सम्मान नहीं करतीं। अगर कभी उन्हें किसी मामले में गलत पाया गया या कठघरे में खडा किया गया तो वो हमेशा इटली भाग सकती हैं। पेरू में राष्ट्रपति फूजीमोरी जो खुद को पेरू में पैदा हुआ बताते थे , जब भ्रष्टाचार के मामले में फंसे और उन पर अभियोग चलने लगा तो वो जापान भाग गये और जापानी नागरिकता के लिए दावा पेश कर दिया। 1977 में जब जनता पार्टी ने चुनावों में कांग्रेस को हराया और नई सरकार बनाई तो सोनिया अपने दोनों बच्चों के साथ नई दिल्ली के इतालवी दूतावास में भाग गईं और वहीं छिपी रहीं यहां तक की इस मौके पर उन्होंने इंदिरा गांधी को भी उस समय छोड़ दिया। ये बात अब कोई नई नहीं है बल्कि कई बार प्रकाशित भी हो चुकी है। राजीव गांधी उन दिनों सरकारी कर्मचारी (इंडियन एयरलाइंस में पायलट) थे। लेकिन वो भी सोनिया के साथ इस विदेशी दूतावास में छिपने के लिए चले गये। ये था सोनिया का उन पर प्रभाव। राजीव १९७८ में सोनिया के प्रभाव से बाहर निकल चुके थे लेकिन जब तक वो स्थितियों को समझ पाते तब तक उनकी हत्या हो चुकी थी। जो लोग राजीव के करीबी हैं , वो जानते हैं कि वो 1981 के चुनावों के बाद सोनिया को लेकर कोई सही कदम उठाने वाले थे। उन्होंने सभी प्रकार के वित्तीय घोटालों और १९७८ के चुनावों में हार के लिए सोनिया को जिम्मेदार माना था। मैं तो ये भी मानता हूं कि सोनिया के करीबी लोग राजीव से घृणा करते थे। इस बात का जवाब है कि राजीव के हत्यारों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के मृत्युदंड के फैसले पर मर्सी पीटिशन की अपील राष्ट्रपति से की गई। ऐसा उन्होंने इंदिरा गांधी के हत्यारे सतवंत सिंह के लिए क्यों नहीं किया या धनंजय चट्टोपाध्याय के लिए नहीं किया ? वो लोग जो भारत से प्यार नहीं करते वो ही भारत के खजाने को बाहर ले जाने का काम करते हैं, जैसा मुहम्मद गौरी, नादिर शाह और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के रॉबर्ट क्लाइव ने किया था। ये कोई सीक्रेट नहीं रह गया है। लेकिन सोनिया गांधी तो उससे भी आगे निकलती हुई लग रही हैं। वो भारतीय खजाने को जबरदस्त तरीके से लूटती हुई लग रही हैं।
जब इंदिरा गांधी और राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे तो एक भी दिन ऐसा नहीं हुआ जब क्रेट के क्रेट बहुमूल्य सामानों को बिना कस्टम जांच के नई दिल्ली या चेन्नई इंटरनेशनल एयरपोर्ट से रोम न भेजा गया हो। सामान ले जाने के लिए एयर इंडिया और अलीटालिया को चुना जाता था। इसमें एंटिक के सामान, बहुमूल्य मूर्तियां, शॉल्स, आभूषण, पेंटिंग्स, सिक्के और भी न जाने कितनी ही बहुमूल्य सामान होते थे। ये सामान इटली में सोनिया की बहन अनुष्का उर्फ अलेक्सांद्रो मैनो विंसी की रिवोल्टा की दुकान एटनिका और ओरबासानो की दुकान गणपति पर डिसप्ले किया जाता था। लेकिन यहां उनकी बिक्री ज्यादा नहीं थी इसलिए इसे लंदन भेजा जाने लगा और सोठेबी और क्रिस्टी के जरिए बेचा जाने लगा। इस कमाई का एक हिस्सा राहुल गांधी के वेस्टमिनिंस्टर बैंक और हांगकांग एंड शंघाई बैंक की लंदन स्थित शाखाओं में भी जमा किया गया। लेकिन ज्यादातर पैसा गांधी परिवार के लिए काइमन आइलैंड के बैंक आफ अमेरिका में है। राहुल जब हार्वर्ड में थे तो उनकी एक साल की फीस बैंक आफ अमेरिका काइमन आइलैंड से ही दी जाती थी। मैं वाजपेई सरकार को इस बारे में बार-बार बताता रहा लेकिन उन्हें विश्वास में नहीं ले सका , तब मैने दिल्ली हाईकोर्ट में एक पीआईएल दायर की। कोर्ट ने इस मामले में सीबीआई को इंटरपोल और इटली सरकार की मदद लेकर जांच करने को कहा। इंटरपोल ने इन दोनों दुकानों की एक पूरी रिपोर्ट तैयार करके सीबीआई को भी दी, जिसे कोर्ट ने सीबीआई से मुझे दिखाने को भी कहा , लेकिन सीबीआई ने ऐसा कभी नहीं किया। सीबीआई का झूठ तब भी अदालत में सबके सामने आ चुका था जब उसने अलेक्सांद्रो मैनो का नाम एक आदमी का बताया और विया बेलिनी 14 , ओरबासानो को एक गांव का नाम बताया था जबकि मैनो के निवास की स्ट्रीट का पता था। अलबत्ता सीबीआई के वकील द्वारा इस गलती के लिए अदालत के सामने खेद जाहिर करना था लेकिन उसे नई सरकार द्वारा एडिशिनल सॉलिसीटर जनरल के पद पर प्रोमोट कर दिया गया।
एकदम ताजा मामला 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले से जुड़ा हुआ है। पौने दो लाख करोड के 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में 60 हजार करोड रुपए घूस बांटी गई जिसमें चार लोग हिस्सेदार थे। इस घूस में सोनिया गांधी की दो बहनों का हिस्सा 30-30 प्रतिशत है। प्रधानमंत्री सब कुछ जानते हुए भी मूक दर्शक बने रहे। इस घोटाले में घूस के तौर पर बांटे गए 60 हजार करोड़ रुपये का दस प्रतिशत हिस्सा पूर्व संचार मंत्री ए राजा को गया। 30 फीसदी हिस्सेदारी तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि को और 30-30 प्रतिशत हिस्सेदारी सोनिया गांधी की दो बहनों नाडिया और अनुष्का को गया है.
(Dr. S. Swamy)
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20110616

Walk the city: Top 3 cities in US

3. Nearly 70 percent of New York City dwellers don't own a car [source: America's Walking]. Not surprising since the city scored 83 out of 100 on Walk Score's recent rankings. How can they so easily go about their lives without the average 2.2 cars in the driveway? A combination of fleet and feet.

New York City has 24-hour public transportation connecting its five boroughs and the largest fleet of subway cars in the world. According to the U.S. Census Bureau's latest American Community Survey, more than 55 percent of New York commuters ride buses, trains and light rail [source: Christie].
­The New York metro area actually has the highest number of walkable urban places in the United States, according to a Brookings Institution survey [source: Leinberger]. Let's look at Midtown Manhattan: In that neighborhood alone there are thousands of residences, hotels, cultural establishments and stores, in addition to the more than 300 million square feet (27 million square meters) of office space -- it's the most walkable neighborhood in America [source: Leinberger]

2. When Pierre L'Enfant created the design for Washington, D.C.'s city layout in 1791, it was seen as the model for the development of future American cities. Who would have thought that more than 200 years later Washington, D.C., would still be considered a national model of walkable urban growth? Today D.C. has one walkable place for every 264,000 people -- per capita, that's better than New York City. It also earns a 70 from Walk Score [source: MSNBC and Walk Score].


­As part of L'Enfant's city plan, D.C.'s streets are laid out diagonally across a grid system. This may sound cumbersome, but the result is shorter walking distances between points and potential for green space (in the form of triangular parks) at the street intersections. If the sidewalks can't get you where you want to go, the D.C. metro area also has hundreds of miles of pedestrian and bike paths and a widely used public transportation system -- in fact, at 37.7 percent usage, D.C. is a leader in public transportation, second to New York [source: Christie].

1. San Francisco is a walkers' dream, and­ not just because of the mild weather (forget the hills). Only 1 percent of residents live in car-dependent neighborhoods. And a whopping 99 percent of neighborhoods score at least a 50 out of 100 on Walk Score's rankings -- the city itself ranks 86 out of 100 [source: Walk Score].
­Since the early 1970s San Francisco's urban growth plan has kept the relationship between people and their environment at the forefront. Each neighborhood has a distinct feel and manages to combine people's needs -- everything from housing, educational institutions and green space to retail and industry, all with safety in mind. One key piece to this urban growth plan is the San Francisco Municipal Railway system (Muni). Muni run 24 hours a day, seven days a week and is a combination of historic streetcars, commuter rail, diesel buses, alternative fuel vehicles, electric trolley cars and, of course, the famous cable cars. It's been connecting San Francisco's neighborhoods since 1912, and today stops within 2 blocks of 90 percent of all city residences -- more than 200 million people ride each year [source: SFMTA].

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20110615

If Mr. Raja is culpable so is Mr. Chidambaram

May 10, 2011.

Mr. A.P. Singh,
Director,
Central Bureau of Investigation,
CGO Complex, Lodi Road,
New Delhi.

Dear Mr. Singh,

I write this letter to ask whether you have conducted any further inquiry arising out of the charge against the former Telecom Minister Mr. A. Raja { stated on page 59 of the Final Report under Section 173, Cr P.C. submitted in the Court of the Special Judge (CBI), New Delhi in the matter registered on 21.10.2009} since he is alleged to have deprived the Government exchequer of huge revenues because he deliberately and dishonestly gave away the licences of 2G Spectrum at an entry fee cum spectrum price that was determined in 2001.
While it is true that the Finance Ministry at the level of the Finance Secretary had raised the question of revising this price, however, vide the decision taken and notified by the Cabinet Secretariat on December 7, 2006, empowering the Finance Minister and the Minister for Communications & IT to jointly determine the Spectrum price which by TRAI recommendation of 2007 ought to include an entry fee for obtaining the licence as also a price for Spectrum allotment, and a further charge subsequently for its usage.
According to the records, Mr. P. Chidambaram and Mr. A. Raja both then Ministers of the respective portfolios of Finance and Telecom, had corresponded with each other, and subsequently met and finalized the entry fee at around Rs.1651 crores and decided consequently to provide the spectrum allotment bundled free with the licence of several megahertz.
This being so, if Mr. Raja is culpable for fixing a very low price for the 2G spectrum licence, then because of this joint determination, Mr. P. Chidambaram is also prima facie culpable on the same charge as Mr. Raja.
Hence, please inform me at the very earliest and before the Supreme Court summer vacation period begins, of any step that you may have taken to date.

Yours sincerely,
(SUBRAMANIAN SWAMY)
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जब राहुल गांधी को पकड़ लिया गया था

२ जून २००१ में राहुल गांधी को Boston Airport पर US Federal Police, FBI द्वारा $ १६०,०००/- की अघोषित रकम के साथ पकड़ लिया गया था. तब की बाजपेयी सरकार में मुख्य सचिव ब्रजेश मिश्र ने राहुल को एड़ी चोटी का जोर लगा कर बचाया था.

उनकी मेहनत बेकार नहीं गयी. समय आने पर कांग्रेस ने २०११ में उनको पद्म विभूषण से नवाजा.
(from press release of Dr. Swamy, 14-02-2011)
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