20100119

मँहगाई के मुसीबत की अनकही इबारत

हमारे कृषि मंत्री शरद पवार कह रहे हैं कि मंहगाई रोक पाना उनके वश में नहीं है. अब वे साफ तौर पर अपने हाथ खड़े कर चुके हैं और कह रहे हैं कि अगर मंहगाई को रोकना है तो राज्य सरकारों को ही पहल करनी होगी. राज्य सरकारें केन्द्र सरकार को दोष दे रही हैं. लेकिन मंहगाई की लगातार बढ़ती मार का असल कारण क्या है?

भारत इकलौता ऐसा निकास शील देश है जहां कीमतें बढ़ रही हैं. पूरी दुनिया मंदी के दौर से गुज़र रही है और इस चक्कर में हर जगह खाने पीने की चीज़ों और ईंधन की कीमत घट रही है .लेकिन अपने यहाँ बढ़ रही है. यह सत्ताधारी पार्टियों की असफलता का सबूत है.खाने के सामान की जो कीमतें बढ़ रही हैं उसके लिए बड़ी कंपनियां ज़िम्मेदार हैं. राजनीतिक पार्टियों को मोटा चंदा देने वाली लगभग सभी पूंजीपति घराने उपभोक्ता चीज़ों के बाज़ार में हैं. खराब फसलकी वजह से होने वाली कमी को यह घराने और भी विकराल कर दे रहे हैं क्योंकि उनके पास जमाखोरी करने की आर्थिक ताक़त है. उनके पैसे से चुनाव लड़ने वाली पार्टियों के नेताओं की हैसियत नहीं है कि उनकी जमाखोरी और मुनाफाखोरी पर कुछ बोल सकें..जब केंद्र सरकार ने मुक्त बाज़ार की अर्थव्यवस्था की बात शुरू की थी तो सही आर्थिक सोच वाले लोगों ने चेतावनी दी थी कि ऐसा करने से देश पैसे वालों के रहमो करम पर रह जाएगा और मध्य वर्ग को हर तरफ से पिसना पडेगा.आज भी महंगाई घटाने का एक ही तरीका है कि केंद्र और राज्य सरकारें राजनीतिक इच्छा शक्ति दिखाएँ और कला बाजारियों और जमाखोरों के खिलाफ ज़बरदस्त अभियान चलायें. खाद्यान में फ्यूचर ट्रेड को फ़ौरन रोकें. सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मज़बूत करें और राशन की दुकानों के ज़रिये सकारात्मक हस्तक्षेप करके कीमतों को फ़ौरन कण्ट्रोल करें.. राशन की दुकानों के ज़रिये ही खाद्य तेल, चीनी और दालों की बिक्री का मुकम्मल बंदोबस्त किया जाना चाहिए.. सच्ची बात यह है कि जब बाज़ार पर आधारित अर्थव्यवस्था के विकास की योजना बना कर देश का आर्थिक विकास किया जा रहा हो तो कीमतों के बढ़ने पर सरकारी दखल की बात असंभव होती है. एक तरह से पूंजीपति वर्ग की कृपा पर देश की जनता को छोड़ दिया गया है. अब उनकी जो भी इच्छा होगी उसे करने के लिए वे स्वतंत्र हैं.करोड़ों रूपये चुनाव में खर्च करने वाले नेताओं के लिये यह बहुत ही कठिन फैसला होगा कि जमाखोरों के खिलाफ कोई एक्शन ले सकें.

इसे देश का दुर्भाग्य ही माना जाएगा कि शहरी मध्यवर्ग के लिए हर चीज़ महंगी है लेकिन इसे पैदा करने वाले किसान को उसकी वाजिब कीमत नहीं मिल रही है. किसान से जो कुछ भी सरकार खरीद रही है उसका लागत मूल्य भी नहीं दे रही है. अभी पिछले दिनों दिल्ली में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों का जमावड़ा हुआ था तो दिल्ली के मीडिया और अन्य लोगों को पता चला था कि किसान को उतनी रक़म भी गन्ने की कीमत के रूप में नहीं मिलती जितनी उसकी लागत आती है.यही हाल बाकी फसलों का भी है. यानी किसान को उसकी लागत नहीं मिल रही है और शहर का उपभोक्ता कई गुना ज्यादा कीमत दे रहा है. इसका मतलब यह हुआ कि बिचौलिया मज़े ले रहा है. किसान और शहरी मध्यवर्ग की मेहनत का एक बाद हिस्सा वह हड़प रहा है.और यह बिचौलिया गल्लामंडी में बैठा कोई आढ़ती नहीं है. वह देश का सबसे बड़ा पूंजीपति भी हो सकता है और किसी भी बड़े नेता का व्यापारिक पार्टनर भी .इस हालत को संभालने का एक ही तरीका है कि जनता अपनी लड़ाई खुद ही लड़े. उसके लिए उसे मैदान लेना पड़ेगा और सरकार की पूजीपति परस्त नीतियों का हर मोड़ पर विरोध करना पड़ेगा..

महंगाई एक ऐसी मुसीबत है जिसकी इबारत हमारे राजनेताओं ने उसी वक़्त दी थी जब उन्होंने आज़ादी के बाद महात्मा गाँधी की सलाह को नज़र अंदाज़ कर दिया था. गाँधी जी ने बताया था कि स्वतंत्र भारत में विकास की यूनिट गावों को रखा जाएगा. उसके लिए सैकड़ों वर्षों से चला आ रहा परंपरागत ढांचा उपलब्ध था. आज की तरह ही गावों में उन दिनों भी गरीबी थी .गाँधी जी ने कहा कि आर्थिक विकास की ऐसी तरकीबें ईजाद की जाएँ जिस से ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों की आर्थिक दशा सुधारी जा सके और उनकी गरीबी को ख़त्म करके उन्हें संपन्न बनाया सके. अगर ऐसा हो गया तो गाँव आत्म निर्भर भी हो जायेंगें और राष्ट्र की संपत्ति और उसके विकास में बड़े पैमाने पर योगदान भी करेंगें. उनका यह दृढ विश्वास था कि जब तक भारत के लाखों गाँव स्वतंत्र ,शक्तिशाली और स्वावलंबी बनकर राष्ट्र के सम्पूर्ण जीवन में पूरा भाग नहीं लेते तब तक भारत का भावी उज्जवल हो ही नहीं सकता( ग्राम स्वराज्य)...

लेकिन ऐसा हुआ नहीं. महात्मा गाँधी की सोच को राजकाज की शैली बनाने की सबसे ज्यादा योग्यता सरदार पटेल में थी. देश की बदकिस्मती ही कही जायेगी कि आज़ादी के कुछ महीने बाद ही महात्मा गाँधी की मृत्यु हो गयी और करीब २ साल बाद सरदार पटेल चले गए. उस वक़्त के देश के नेता और प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरु ने देश के आर्थिक विकास की नीति ऐसी बनायी जिसमें गावों को भी शहर बना देने का सपना था. उन्होंने ब्लाक को विकास की यूनिट बना दी और महात्मा गाँधी के बुनियादी सिद्धांत को ही दफ़न कर दिया..यहीं से गलती का सिलसिला शुरू हो गया..ब्लाक को विकास की यूनिट मानने का सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि गाँव का विकास गाँव वालों की सोच और मर्जी की सीमा से बाहर चला गया और सरकारी अफसर ग्रामीणों का भाग्यविधाता बन गया. फिर शुरू हुआ रिश्वत का खेल और आज ग्रामीण विकास के नाम पर खर्च होने वाली सरकारी रक़म ही राज्यों के अफसरों की रिश्वत का सबसे बड़ा साधन है. उसके बाद जब १९९१ में पी वी नरसिंह राव की सरकार आई तो आर्थिक और औद्योगिक विकास पूरी तरह से पूंजीवादी अर्थशास्त्र की समझ पर आधारित हो गया. बाद की सरकारें उसी सोच को आगे बढाती रहीं और आज तो हालात यह हैं कि अगर दुनिया के संपन्न देशों में बैंक फेल होते हैं तो अपने देश में भी लोग तबाह होते हैं. तथाकथित खुली अर्थव्यवस्था और वैश्वीकरण के चक्कर में हमने अपने मुल्क को ऐसे मुकाम पर ला कर खड़ा कर दिया है जब हमारी राजनीतिक स्थिरता भी दुनिया के ताक़तवर पूंजीवादी देशों की मर्जी पर निर्भर हो गयी है.

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कोई भी मूल्य एवं संस्कृति तब तक जीवित नहीं रह सकती जब तक वह आचरण में नहीं है.

For one year, Rlys charged you what they were told not to

Ahead of the Rail Budget, the Railways is being asked to explain how it continued levying a surcharge that should have stopped March 31, 2007.

Under the scanner is the move by the Railways to convert a safety surcharge on passenger fares into a development charge to raise money for its dedicated freight corridor project. This move, which drew adverse remarks from the Parliamentary Standing Committee on Railways in two successive reports, has even invited queries from the Prime Minister’s Office.

At the centre of the row is a Rs 1,000-crore sum which the Railways will end up collecting as development charge from passengers by the end of the current fiscal. Not a fresh levy, this development charge was essentially a change of name for the safety surcharge which the Ministry had levied since 2001 to raise funds for the Special Railway Safety Fund (SRSF).

Set up in October 2001 following recommendations of the Railway Safety Review Committee headed by Justice H R Khanna, the SRSF was a non-lapsable fund of Rs 17,000 crore to clear arrears in replacement and renewal of overaged safety related assets like tracks, bridges, signal and telecom equipment and rolling stock within a fixed time frame of six years — from 2001-02 to 2006-07.

While Rs 12,000 crore for the SRSF was to come as dividend-free budgetary support from the Central government, the Railways were mandated to mobilise the remaining Rs 5,000 crore through levy of a safety surcharge on passenger fares.

The Railways began levying a safety surcharge, ranging from Re 1 to Rs 100, depending upon the class of travel and the total distance travelled. For travel up to 500 km, a Sleeper Class passenger had to pay Rs 10 as safety surcharge. Similarly, AC-3 and AC-2 passengers invited safety surcharges of Rs 30 and Rs 40 respectively. Exactly double the amounts were charged in case of travel beyond 500 km. The move paid off, generating a substantial sum. For instance, against projections of Rs 750 crore, the Railways earned Rs 850 crore in 2006-07 through the safety surcharge.

With the six year period for SRSF works running out on March 31, 2007, the Railways were supposed to stop levying the safety surcharge beyond that date. But five days before the deadline, the Railway Board came out with a circular stating that the Ministry had decided to subsume the safety surcharge in passenger fares “on as is where is basis in the form of a development charge to fund the dedicated freight corridor”. The circular stated that receipts from the development charge would be included in “passenger earnings” starting April 1, 2007.

Slamming the move, the Parliamentary Standing Committee on Railways called it a “deceptive practice”. In its latest report tabled in Parliament in December 2007, the committee pointed out that the Railways went ahead “inspite of the committee’s repeated recommendations against such a move”.

Disagreeing with the Ministry’s view that imposition of a development surcharge on passenger fares will not result in any change in existing chargeable passenger fares, the committee said that “withdrawal of safety surcharge from the passenger fares would have certainly given some relief to passengers” and that “replacing safety surcharge with development charge has obviously denied this relief to the passengers.”

“The safety surcharge was levied for the specific purpose of raising funds for asset renewals. All the funds required for the Rs 17,000 crore SRSF have already been collected in the fixed tenure. When no extra funds are going to come from the Central exchequer, why should Railways continue to burden the passengers?” said Basudeb Acharia, chairman of the Parliamentary Standing Committee on Railways.

“Converting the safety surcharge into a development charge is an indirect way to earn revenues. It raises questions of propriety considering the fact that it was not mentioned in the last Rail Budget speech. While the Railways make claims of having reduced fares, they are indulging in deceptive practices like these,” he said, adding that the Committee had specifically recommended withdrawal of this charge and sought an Action Taken Report from the Ministry.

When contacted, a Railway Ministry spokesperson declined comment.
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20100117

खुशहाली का जीडीपी से कोई रिश्ता नहीं होता

भारत सरकार देश के विकास के लिए जीडीपी बढ़ाने पर पूरा जोर देती है। उसकी मान्यता है कि जीडीपी अगर 10 फीसदी पर पहुंच जाय तो देश की समस्याएं जैसे गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, गैर-बराबनी काफी हद तक समाप्त हो जायेंगी। पर दुनिया के अन्य देशों का अनुभव इस बात की पुष्टि नहीं करता। इस लेख में यही दिखाया गया है कि जीडीपी ऊँचा होने पर भी लोगों में खुशहाली नहीं आ सकती और जीडीपी कम भी हो तो भी खुशहाली लायी जा सकती है। सं.

5 अक्टूबर 2009 को संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की मानव रिपोर्ट 2009 जारी हुई। इसमें उन देशों का उल्लेख विशेष रूप से किया है जिन्होंने अपने देश में ज्यादा खुशहाली पैदा की है यानी जिनका मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) काफी ऊँचा है। एक बार फिर इस रिपोर्ट ने क्यूबा की असाधारण उपलब्धियों को विशेष रूप से उजागर किया है। विकास के आँकड़ों और अनुमापन पर यह रिपोर्ट सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला स्रोत है। यह प्रत्येक देश की विकास की स्थिति और प्रगति की तुलना करती है।

इस साल के बहुत से आंकड़े दिये हैं। लोगों की खुशहाली के सार सूचकांक एचडीआई को इस्तेमाल करके दिये गये हैं। एचडीआई में चार सूचकांक शामिल किये जाते हैं। जिन्दा रहने की औसत आयु, साक्षरता, स्कूल में भर्ती और प्रतिव्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी)। ये आंकड़े 182 देशों के दिये गये हैं।

गरीबी से पीड़ित छोटा टापू क्यूबा, जिसकी अर्थव्यवस्था को लुंज बनाने के लिए अमरीका ने आर्थिक बिन्दश लगा रखी है, इसके बावजूद मुख्य रूप से लोगों के स्वास्थ्य और शिक्षा में सबसे आगे है। क्यूबा का शिक्षा का सूचकांक दुनिया में सबसे ऊँचा है, उसके बराबर ऑस्ट्रेलिया, फिनलैंड, डेनमार्क और न्यूजीलैण्ड आते हैं। क्यूबा का शिक्षा सूचकांक 0.993 है, प्रौढ़ साक्षरता दर 99 फीसदी है और स्कूल में भर्ती 100 फीसदी है। क्यूबा में शिक्षा पर सरकारी खर्च कुल सरकारी खर्च का 14.2 फीसदी है। यह ऑस्ट्रेलिया (13.3 फीसदी) और अमरीका (13.7 फीसदी) से अधिक है।

प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा में प्रवेश में लड़के-लड़कियों की संख्या का अनुपात दुनिया में सबसे ज्यादा 121 फीसदी है। जिन्दा रहने की उम्र क्यूबा में 78.5 साल है। लातिनी अमरीका में यह उच्चतम है, इसके बराबर चिली की है। यह आस्ट्रेलिया की 81.4 साल और अमरीका की 79.1 साल से मेल खाती है।

स्वास्थ्य और शिक्षा में क्यूबा या तो चोटी पर है, या चोटी के निकट है, पर जीडीपी में यह काफी नीचे है। जीडीपी में यह दुनिया में 95वें स्थान पर आता है। कम जीडीपी के कारण यह मानव विकास रिपोर्ट एचडीआर की सूची में 51वें स्थान पर आता है। फिर भी इसकी एचडीआर रैंकिंग जीडीपी रैंकिंग से काफी ऊँची है। इन दोनों रैंकिंग का अन्तर यह दिखाता है कि कैसे कोई कम आय वाला देश राष्ट्र की आय को कुशलतापूर्वक अपने लोगों के स्वास्थ्य और शिक्षा पर लगा सकता है। इस श्रेणी में क्यूबा दुनिया में बहुत आगे है।

उदाहरण के लिए मेक्सीको का जीडीपी क्यूबा से दूना है, लेकिन इसका एचडीआई नीचे है। प्रतिव्यक्ति जीडीपी में अमरीका 9वें स्थान पर है, पर एचडीआई रैंकिंग में 13वें स्थान पर आता है। यह दिखाता है कि अमरीका अपनी सम्पत्ति को लोगों के स्वास्थ्य और शिक्षा पर कम लगाता है।

रिपोर्ट में एक अनुमापन `जेंडर सशक्तीकरण´ है। इसका एक सूचकांक है संसद में महिला सीटों की संख्या। क्यूबा में 43 फीसदी संसद की सीटें महिलाओं के पास है। यह दुनिया में तीसरा स्थान है, पहले स्थान पर रुआंडा (51 फीसदी) और दूसरे पर स्वीडेन (47 फीसदी) है। आस्ट्रेलिया 30 फीसदी और अमरीका में केवल 17 फीसदी है, भारत में 7 फीसदी है। 2005 से अजरबैजान, क्यूबा और बेनेजुएला ने अपना एचडीआई अन्य देशों की तुलना में ज्यादा बढ़ाया हैं। पिछले साल के मुकाबले बैनेजुएला 4 सीढ़ी ऊपर चढ़ गया है 62 से 58 पर पहुंचा है। एचडीआई में भी बैनेजुएला ने 2000 से 2007 तक काफी प्रगति की है। इस अवधि में उसकी दर 5.2 फीसदी रही है। जबकि इससे पहले 20 सालों में यह 4.8 फीसदी रही थी।

विकास का एक सूचकांक गैर-बराबरी है। एचडीआई में आस्ट्रेलिया दूसरे स्थान पर है। तथाकथित विकसित देशों में यह सबसे अधिक गैर-बराबरी वाले देशों में से एक है। रिपोर्ट बताती है कि आस्ट्रेलिया की आबादी में सबसे अमीर 10 फीसदी लोगों की आमदनी सबसे गरीब 10 फीसदी लोगों की आमदनी से 12.5 गुनी ज्यादा है। जापान में यह अनुपात 4.5, नार्वे में 6.1 और स्वीडन में 6.2 है अमरीका में यह आंकड़ा 15.9 है, क्यूबा में 4 है और शायद दुनिया में यह सबसे अच्छा है।

इस रिपोर्ट से एक निष्कर्ष निकलता है कि 1. जो सरकार, जैसे अमरीका और आस्ट्रेलिया में गुणवत्ता पूर्ण स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा को कुछ लोगों का विशेषाधिकार बना देती है, वह गैर बराबरी पैदा करती है और बढ़ाती है। 2. जो सरकार जैसे क्यूबा में, अपने सभी नागरिकों को मुफ्त शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराती है, सभी को लाभ पहुंचाती है और वह गैर-बराबरी को कम करती है.

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तेलंगाना के तीरंदाज: चंद्रशेखर राव

अभी पांच महीने पहले जिन चंद्रशेखर राव ने अपनी ही पार्टी से इस्तीफा दे दिया था और पार्टी के कुछ नेताओं पर आरोप लगाया था कि उन्हें और उनके परिवार को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है वही कल्वाकुंतला चंद्रशेखर राव (केसीआर) अब तेलंगाना के नायक और आंध्र के खलनायक बनकर पूरी तरह से उभर आये हैं. कोई उन्हें नायक समझे या खलनायक लेकिन इतिहास के पन्नों पर उन्होंने वह लाइन लिख दी है जो उन्हें हैदराबाद के निजाम के बराबर ला खड़ा करता है. राजनीतिक रूप से राव अब दक्षिण की बड़ी शख्सियतों में शामिल हो गये हैं.

हैदराबाद रियासत के मद्रास प्रेसिडेन्सी में विलय के साथ ही निजामशाही का खात्मा हो गया था और तेलंगाना को भी बाद में मद्रास प्रेसिडेन्सी से अलग हुए राज्य आंध्र प्रदेश का हिस्सा बना दिया गया था. लेकिन तेलंगाना अपनी सांस्कृतिक पहचान पाने के लिए अपने अलग राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई से कभी पीछे नहीं हटा. हालांकि यह लड़ाई कमजोर और क्षीण थी और अलग तेलंगान की मांग कभी वैसी तेज नहीं हो पायी जैसी अलग आंध्र प्रदेश की मांग थी. फिर भी अलग तेलंगाना की मांग कायम बनी रही. कहते हैं व्यक्ति समय को प्रभावित नहीं करता बल्कि समय व्यक्ति का चयन करती है. राव का राजनीतिक उदय बिल्कुल इस बात को सटीक रूप से सत्यापित करता है. समय ने तेलंगाना के सवाल पर मानो चंद्रशेखर राव का वरण कर लिया था और देखते देखते राव इतिहास पुरुष हो गये.

चंद्रशेखर राव का जन्म 1954 में मेडक जिले में हुआ था जहां उनके पूर्वज कई पीढ़ी पहले आकर बस गये थे. चंद्रशेखर राव शुरू से राजनीतिक महत्वाकांक्षा के व्यक्ति नहीं थे इसलिए शुरूआती पढ़ाई लिखाई के बाद घर परिवार चलाने के लिए उन्होंने कमाई के लिए खाड़ी देशों के लिए जानेवाले लोगों का वीजा बनवाना शुरू किया. लेकिन टीडीपी के उदय ने उनके मन में राजनीतिक ललक पैदा कर दी. जिन दिनों एनटीआर आंध्र की राजनीति का समाजशास्त्र बदलने में लगे थे उन्हीं दिनों वे टीडीपी के साथ आ गये और राजनीति में हाथ आजमाने शुरू कर दिये. एनटीआर की मौत के बाद वे चंद्राबाबू के साथ हो गये. जब चंद्राबाबू दूसरी बार मुख्यमंत्री बने तो केसीआर कैबिनेट मंत्री बनना चाहते थे. लेकिन चंद्राबाबू ने उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाने की बजाय विधानसभा का डिप्टी स्पीकर बना दिया. केसीआर को यह बात नागवार गुजरी और 2001 में उन्होंने टीडीपी से किनारा कर तेलंगाना राष्ट्र समिति का गठन कर दिया.

पार्टी के अलग निशान के साथ ही एक पहचान और मुद्दे की जरूरत भी होती है. केसीआर ने देखा कि तेलंगाना के सवाल को फिर से सुलागाया जा सकता है जिससे पार्टी को आंध्र के हिस्से में अच्छा खासा जनाधार मिल जाएगा. राजनीतिक रूप से यह फैसला बहुत सही था क्योंकि राज्य में कांग्रेस और टीडीपी के बीच स्पेश बनाने के लिए किसी सटीक राजनीतिक मुद्दे का होना जरूरी था. केसीआर ने वही किया. उन्होंने अलग तेलंगाना की मांग उठायी. उसका नतीजा यह हुआ कि टीआरएस गठन के साथ ही एक ताकतवर पार्टी के रूप में उभरने लगी. 2004 के राज्य विधानसभा चुनावों में टीडीपी का सफाया करने के लिए कांग्रेस के नेता वाईएस राजशेखर रेड्डी ने चंद्रशेखर राव से हाथ मिला लिया। इसका जितना फायदा कांग्रेस को हुआ उससे अधिक फायदा टीआरएस को हुआ. टीआरएस के 26 विधायक हैदराबाद पहुंच गये और 5 सांसद दिल्ली. राजशेखर रेड्डी ने चंद्रशेखर राव से वादा किया था कि वे तेलंगाना बनवाने में उन्हें हर प्रकार की मदद करेंगे और तेलंगाना किसी भी समय हकीकत में तब्दील हो सकता है. दिल्ली की सरकार में चंद्रशेखर राव को मंत्री तो बनाया गया लेकिन कांग्रेस के मन में अलग तेलंगाना को लेकर कोई गंभीर विचार नहीं था इसलिए लगातार पांच साल तक चंद्रशेखर राव को हाशिये पर रखा गया. राज्य और केन्द्र दोनों जगहों पर कांग्रेस का काम निकल चुका था और अब राव को राजनीतिक पटखनी मिल चुकी थी और सिवाय धूल झाड़ने के वे कुछ नहीं कर सकते थे.आखिरकार तंग आकर सितंबर 2006 में राव ने केन्द्र सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया और तेलंगाना के आंदोलन को आगे बढ़ाने का निश्चय किया.

2008 में आंध्र में हुए उपचुनाव ने उन्हें एक बार फिर सफलता दी और 7 विधानसभा तथा 2 लोकसभा सीटें जीतने में कामयाब रहे. चंद्रशेखर राव तेलंगाना में अब राजनीतिक आका के रूप में उभर चुके थे. इसका परिणाम यह हुआ कि जिन चंद्राबाबू नायडू ने कभी उन्हें राज्य में कैबिनेट मंत्री नहीं बनाया था उन्हीं चंद्राबाबू ने 2009 के चुनाव में उनके साथ आ खड़े हुए और अलग तेलंगाना को अपना समर्थन दे दिया. लेकिन 2009 के राज्य विधानसभा और लोकसभा के चुनाव राव के लिए झटका साबित हुए. 2009 के चुनाव में वाईएस राजशेखर रेड्डी का जादू पूरे आंध्र में चला जिससे तेलंगाना भी अछूता नहीं रहा. टीआरएस को राज्य विधानसभा में सिर्फ 10 सीटें मिलीं. ऊपर से चंद्रशेखर राव के ऊपर टिकट बेचकर पैसा बनाने का आरोप भी लगा लेकिन करीमनगर लोकसभा सीटे से भारी अंतर से जीतने में कामयाब रहे. राव के ऊपर उन्हीं के पार्टी नेताओं ने आरोप लगाये कि पार्टी का टिकट बेचकर उन्होंने 10 करोड़ रुपये कमाए हैं. क्षोभग्रस्त राव ने अपनी ही बनायी पार्टी से 19 जून 2009 को इस्तीफा दे दिया.

इसी हताशा और निराशा के दौर में राव यह तो महसूस कर ही रहे थे कि उनके मूल मुद्दे पर लौटे बिना उनकी राजनीतिक वापसी संभव नहीं होगा. कांग्रेस के जिस नेता पर उन्होंने विश्वास कर कांग्रेस से गठजोड़ किया था वे भी अब इस दुनिया में नहीं थे और अगर राव सक्रिय नहीं होते तो कांग्रेस के कमजोर होने से जो जगह बनती वहां टीडीपी काबिज हो जाती. इसलिए राव ने पार्टी के अंदरूनी संकट और घटती राजनीतिक औकात को बढ़ाने के लिए अचानक ही आमरण अनशन का निर्णय ले लिया. ग्यारह दिन के आमरण अनशन ने न केवल आंध्र के भूगोल और राजनीतिक को हमेशा के लिए बदल दिया बल्कि चंद्रशेखर राव की निजी जिंदगी भी हमेशा हमेशा के लिए बदल गयी. अब वे तेलंगाना के जन्मदाता के तौर पर याज किये जाएंगे. आनेवाले दिनों में तेलंगाना एक हकीकत बनेगा और चंद्रशेखर राव उस हकीकत को सामने लाने वाले इतिहास पुरुष. निश्चित रूप से समय ने राव का सटीक चुनाव किया और अपना काम कर गया.

(www.visfot.com)

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नए साल के जश्न से पहले

• एक सरकारी रिपोर्ट कहती है कि भारत में ग़रीबी बढ़ी है और अब हर तीसरा भारतीय दरिद्र है.

• मुंबई मेट्रोपोलिटन रिजनल डवलपमेंट अथॉरिटी के आयुक्त रत्नाकर गायकवाड का कहना है कि मुंबई में 54 प्रतिशत आबादी झुग्गियों में रहती है. लेकिन वे यातायात को सबसे बड़ी चुनौती मानते हैं.

• भारत के गृहमंत्री ने कहा है कि नक्सली अब देश के 20 राज्यों के 223 ज़िलों में फैल गए हैं.

• साल भर में औसतन एक हज़ार फ़िल्म बनाने वाले भारतीय बाज़ार में अच्छी कही जाने लायक फ़िल्मों की संख्या दहाई तक भी नहीं पहुँच पाई है.

(विनोद वर्मा)

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20100114

A drop of water can cause forest fire: Study

In a discovery that would back the long held belief that watering plants in the midday sun can burn them, British researchers have found that the same process could also lead to forest fires. Researchers at Eotvos University in Hungary found that water droplets on dry and green leaves act as a magnifying glass to sunrays falling on them, causing fire in forests. Our experiments showed that ‘in sunshine water drops residing on smooth hairless plant leaves are unlikely to damage the leaf tissue," said lead researcher Gabor Horvath.

"However, water drops held by plant hairs could lead to forest fires, theoretically, if the focal region of drops falls exactly on the dry plant surface." The team also suggested that, similarly, exposing hairy human skin to direct sunlight immediately after taking a bath could lead to sunburn.

According to the study, published in New Phytologist, the team carried out both computational and experimental studies to clarify the environmental conditions under which sunlit water drops can cause leaf burn. They found that water droplets on a smooth surface, such as maple or ginkgo leaves, do not cause leaf burn.

However, floating fern leaves that have small wax hairs are susceptible to leaf burn as hairs on the surface holds water droplets in focus acting as a magnifying glass. The same phenomenon can lead to sunburns in humans when water droplets are held on the skin by body hair," Hovarth added.
(Indian express)
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20100108

Biased Sacred Heart sacked Ruchika, strip principal of award: Inquiry report

Ruchika Girhotra was thrown out in a “selective, arbitrary, biased and unwarranted manner” by Sacred Heart School “under outside compelling circumstances”, the magisterial Inquiry into the expulsion has found.

This would “certainly have contributed to mortifying the self-esteem, self-confidence, integrity and reputation of a young minor girl, thereby traumatizing and indelibly scarring her impressionable mind,” says the report, released by the Chandigarh Administration today.

The 45-page report has recommended that Principal Sister S. Sebastina, who was also principal when Ruchika was expelled, should be stripped of the State Award conferred on her in 2005.

Copies of the findings should be sent to CBSE and the Superintendent of Police, Panchkula, for “appropriate legal action” against the school and the principal, says the report, which has been endorsed by the Union Territory Administration.

Sub-Divisional Magistrate Prerna Puri found that Ruchika was the only student in the history of Sacred Heart ever to have been expelled on grounds of non-payment of school fees. In the 22 years between 1987 and 2009, a total 135 students defaulted in paying their fees, but no one except Ruchika was expelled.


Among the students who defaulted was Priyanjli Rathore, the daughter of S P S Rathore, the former DGP of Haryana who has been convicted of molesting Ruchika, and who is accused by the family of driving Ruchika to suicide.


Rathore’s daughter, who was Ruchika’s batchmate, defaulted on two occasions — one of which was in 1990, the same year in which Ruchika was expelled.

In fact, a total of 17 students defaulted in 1990-91, eight of whom did not pay their fees for a period longer than Ruchika’s. Ruchika was expelled for not paying fees for April-September 1990; one of her classmates paid for the first time only in October 1990.

Ruchika had defaulted for a period of eight months the previous year as well, when she was in Class 9. But no action was taken then. When Rathore molested her, she was in Class 10 — that incident happened in August, and a month later, she was expelled.

The Inquiry Officer went through 22 years’ records in the school and the Indian Bank where fees were deposited, in reaching her conclusions. The Inquiry recorded the statements of school officials, Ruchika’s teachers, classmates, family members and S P S Rathore.

Sister Sebastina told the SDM that “verbal instructions were issued to the school bursar to inform the class teacher to strike off the name of Ruchika Girhotra from the school rolls” after she failed to pay her fees. The principal conceded that “no notice/warning/letter was given to the parents of Ruchika Girhotra regarding non payment of fees”.

Sister Sebastina told the Inquiry that she had decided independently to expel Ruchika, and “there was no pressure from any quarter that influenced her decision in this regard whatsoever”.

SDM Puri, however, wrote that the principal’s claim “cannot be believed in the face of telling circumstances of the case”.

On the Girhotra family’s charge that the school acted on Rathore’s behest, the SDM wrote, “Although no direct evidence is available, it is quite probable in view of the strong circumstantial evidence to the effect that Ruchika’s expulsion was proximate in time and followed close on the heels of the incident of molestation. This aspect in my view requires an in-depth and thorough probe.”

The severe indictment of the principal notwithstanding, the UT Administration has ruled out action against the school. “As the future of 2,500 students is at stake, we don’t press for cancelling the school’s affiliation for one person’s mistake,” said UT Secretary (Education-cum-Home) Ram Niwas.

“However, legal action will take its course, for which we have forwarded the report’s copy to Panchkula police for necessary action,” he added.
(Indian Express)
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कोई भी मूल्य एवं संस्कृति तब तक जीवित नहीं रह सकती जब तक वह आचरण में नहीं है.