रोहिंटन को सात गोलियां लगीं. और जब उनकी लाश बरामद हुई तो उसकी हालत ऐसी थी कि उन्हें सिर्फ उनकी उंगली में मौजूद अंगूठी से ही पहचाना जा सकता था. 48 साल का ये शख्स अपने पीछे छोड़ गया दो किशोरवय बो और अनगिनत अधूरे सपने. इनमें से कुछ सपने तहलका के लिए भी थे जहां रोहिंटन पिछले दो सालों से बतौर स्ट्रैटेजिक एडवाइजर काम कर रहे थे. वे एक करिश्माई व्यक्तित्व थे और मीडिया मार्केटिंग में उनका करिअर सफलता की कहानियों से मिलकर बना था.
विडंबना देखिए कि आखिर में रोहिंटन और उन जसे सैकड़ों बेगुनाहों की मौत की वजह राजनीति ही रही. वही राजनीति जो इस देश में हर दिन गरीबी, भुखमरी और उपेक्षा से हो रही लाखों मौतों की जड़ में है. अगर मुंबई में मरने वालों में से ज्यादातर उससे ताल्लुक रखने वाले नहीं होते तो देश की ज्यादातर दौलत और सुविधाओं तक पहुंच रखने वाले अभिजात्य वर्ग को इसकी फिक्र तक न होती. मगर मुंबई की घटना पर आज अगर सबसे ज्यादा शोर देश का यही कुलीन वर्ग मचा रहा है तो वजह सिर्फ यही है कि आतंक का ये जानवर आज अचानक अपनी सभी हदें पार कर उन संगमरमरी चारदीवारियों के भीतर घुस आया है जिनमें आज तक ये वर्ग खुद को सुरक्षित महसूस किया करता था. द ताज और द ओबेरॉय जसी जगहों पर इसी कुलीन वर्ग के लोग ठहरते हैं और खाना खाते हैं. वे पूछ रहे हैं. क्या इस देश में अब कोई जगह महफूज नहीं रही?
जिस कड़वी हकीकत से भारत का कुलीन वर्ग पांचसितारा होटलों में नजर आ रहे मलबे के टुकड़ों को देखकर दो-चार हो रहा है उसी कडवे सच को करोड़ों आम भारतीय रोज ङोलने को मजबूर हैं. भुखमरी से मर रहे बच्चे, आत्महत्या कर रहे किसान, शोषण का शिकार हो रहे दलित, सैकड़ों साल पुराने बसेरों से खदेड़े जा रहे आदिवासी, कारखानों के लिए जमीनों से बेदखल हो रहे किसान, अलग-थलग पड़ रहे अल्पसंख्यक..वे जानते हैं कि कुछ ऐसा है जो बहुत गलत हो रहा है. वे जानते हैं कि व्यवस्था काम नहीं करती, ये क्रूर हो गई है, इसमें इंसाफ नहीं मिलता और ये बस उन्हीं के लिए है जो इसे चला रहे हैं. कुलीन वर्ग से ताल्लुक रखने वाले हम लोगों को समझना होगा कि हममें से ज्यादातर इस व्यवस्था से मिले हुए हैं. ज्यादा संभावना यही है कि हमारे पास जितनी ज्यादा सुविधाएं और पैसा है इस अन्यायी व्यवस्था को पनपाने में हमारी भूमिका उतनी ही बड़ी हो.
इस तरह से देखा जाए तो हम दो तरह से दोषी हैं. एक, उस सामूहिक प्रयास को विस्मृत करने के और दूसरा, जो हो रहा है उसको बिना विरोध किए स्वीकारने के. ऐसा हमारी स्वार्थी वृत्ति और उथली सोच के कारण हुआ है. शाइनिंग इंडिया में हम जैसे साधनसंपन्न लोगों की जिंदगी बेहतर होती जा रही है और हमें लग रहा है कि सब कुछ बढ़िया चल रहा है. हम इस आधे सच में जीकर खुश हैं और बाकी लोगों की मुश्किल जिंदगी को देखना ही नहीं चाहते. दूसरे समाजों के पतन का कारण बने कुलीन वर्ग की तरह हम भी अपनी ऊर्जा का ज्यादातर हिस्सा सोचने-विचारने की बजाय खूब कमाने और उसे उड़ाने पर खर्च कर रहे हैं. हम चटपटी गपबाजियों में वक्त बिता रहे हैं और उन चीजों की तरफ नहीं देख रहे जिनसे हम असहज महसूस करते हैं.
कई सालों से ये साफ दिखाई दे रहा है कि जिस समाज में हम रहते हैं वह भेदभाव, भ्रष्टाचार, कट्टरता, नाइंसाफी जसी बुराइयों के चलते खोखला होता जा रहा है. राजनीतिक नेतृत्व लगातार उन नीतियों पर चलता जा रहा है जो जाति, भाषा, धर्म, वर्ग, समुदाय और क्षेत्र जसी दरारों को चौड़ा कर समाज को बांटती जा रही हैं. दुनिया के सबसे जटिल समाज के अभिजात्य वर्ग के रूप में हम ये देखने में असफल रहे हैं कि हमारे जटिल तानेबाने के कई जोड़ अत्यधिक संवेदनशील हैं. यानी एक गलती हादसों की एक पूरी श्रंखला पैदा कर सकती है. कांग्रेस ने अकालियों की हवा निकालने के लिए जनरैल सिंह भिंडरावाले को पैदा किया, भिंडरावाले ने आतंकवाद को पैदा किया, इंदिरा गांधी ने आतंकवाद के खिलाफ मोर्चा खोला, आतंकवाद ने इंदिरा गांधी की जान ले ली और इंदिरा गांधी की मौत से हुई हिंसा हजारों बेगुनाह सिखों के नरसंहार की वजह बनी. इस एक दशक के दौरान अनगिनत बेगुनाह, उग्रवादी और सुरक्षाकर्मी मारे गए. इसी तरह मंडल की हवा निकालने के लिए भाजपा ने कमंडल का कार्ड खेला, उन्मादी कार सेवकों ने बाबरी मस्जिद गिरा दी, दंगे भड़के, बदला लेने के लिए मुंबई धमाके हुए, दस साल बाद गुजरात में कार सेवकों से भरी एक बोगी जली, अगले कुछ दिनों में राज्य में 2000 मुसलमानों का नरसंहार हुआ, छह साल बाद आज भी इसकी प्रतिक्रिया में हिंसा जारी है.
एक और उदाहरण है. 1940 के दशक की शुरुआत में आजादी की लड़ाई के बीच में अचानक कुलीन मुस्लिम वर्ग एक अलग इस्लामी देश की मांग करने लगा, महात्मा गांधी ने इसका विरोध किया, अंग्रेजों ने इसका समर्थन किया, बंटवारा हुआ, दंगों में दस लाख लोग मारे गए, दो देशों में चार लड़ाइयां हुईं, दोनों की ऊर्जा का बड़ा हिस्सा एक दूसरे के खिलाफ खर्च हुआ, परमाणु हथियारों का जखीरा बना, मुंबई पर हमला हुआ.
इन सभी श्रंखलाओं में एक बात समान है. इनकी शुरुआत कुलीन वर्ग द्वारा लिए गए फैसलों से हुई. अनिगिनत विविधताओं से गुंथकर बना भारत का ताना-बाना बेहद नाजुक और जटिल है. कुलीन वर्ग के लिए ये बहुत अहम है कि वह इस तानेबाने और उसमें अपनी भूमिका को समझे. पूंजी, प्रभाव और सुविधाएं उसके नियंत्रण में हैं. वह इस ताने-बाने की मरम्मत कर सकता है. उसके पास देने के लिए काफी कुछ है और उसे उदारता से देना ही होगा. आम जनता, जिसके पास कुछ भी नहीं है, का गुस्सा और क्षोभ इस तानेबाने को सिर्फ पूरी तरह से ढहा सकता है. और याद रखें कि ज्वालामुखी जब फटता है तो उसमें अमीर और गरीब सभी समान रूप से जल जाते हैं.
सवाल उठता है कि फिर हमें क्या करना चाहिए? नेताओं को गालियां देने को निश्चित रूप से राजनीतिक जागरूकता नहीं कहा जा सकता. और वातानुकूलित जिंदगी जीने वालों की पाकिस्तान पर बम गिराने और टैक्स न भरने की मांग को भी बेतुका ही कहा जाएगा. इस तरह के मूर्खतापूर्ण नाटक को दिखाने की बजाय मीडिया को इसकी उपेक्षा करनी चाहिए. दुनिया में दुश्मनी की पहले ही अति हो चुकी है. हमें इसे शांत करने की जरूरत है न कि भड़काने की. जहां तक पाकिस्तान का सवाल है तो वह तो खुद ही गिरी हुई राजनीति की वजह से बर्बाद है. इसे बमों की बरसात की नहीं बल्कि मदद के हाथ की जरूरत है. याद रखना होगा कि जब संवेदनहीन नौकरशाह गुस्से में अपने दांत पीसते हैं तो इसका शिकार मासूम बच्चों को होना पड़ता है.
सबसे पहले हमें सच को ईमानदारी से स्वीकारने की जरूरत है. इस बात को मानने की जरूरत है कि हमने राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया की गाड़ी पटरी से उतार दी है. पांच करोड़ भारतीयों की समृद्धि से देश विकसित नहीं हो जाएगा, खासकर तब जब 50 करोड़ लोगों के लिए जिंदा रहना ही एक संघर्ष हो. आजादी के 60 साल बाद भी आसानी से कहा जा सकता है कि भारत के राजनीतिक नेतृत्व और कुलीन वर्ग ने देश के वंचितों को बुरी तरह निराश किया है. अगर आप देखने की जहमत उठाएं तो आज का भारत वो जगह है जहां नवजात बो मक्खियों की तरह मरते हैं और जहां समान अवसरों की बात एक क्रूर मृगतृष्णा से ज्यादा कुछ नहीं.
एक बात हमें साफ तौर पर जान लेनी चाहिए. हम पर संकट इसलिए नहीं है क्योंकि ताज में मौत का तांडव हुआ बल्कि इसलिए है कि गुजरात में 2000 मुसलमानों की हत्या के छह साल बाद भी इंसाफ का दूर-दूर तक नामोनिशान नहीं है. गैरबराबरी के बाद ये दूसरी बात है जिसे कुलीन वर्ग को समझना होगा. सभ्यता की शुरुआत से ही हर समाज की बुनियाद इंसाफ का पहिया रहा है. आप सिर्फ उन लोगों के लिए ही मोमबत्तियां कैसे जला सकते हैं जो आपके वर्ग से हों. आपको हर नागरिक के लिए आवाज उठानी होगी.
काश मुंबई में पिछले हफ्ते बरसे आतंक में रोहिंटन की जान बच जाती. एक पल में वे हमारा पक्ष समझ गए होते. आर्थिक और सामाजिक सुधारों से कहीं ज्यादा जरूरत आज राजनीति में आमूल-चूल बदलाव की है, उस शुचिता की, जिसने देश को आजादी दिलाई. भारत के कुलीन वर्ग को अपने हाथों के गंदे होने का डर छोड़ना होगा. तभी उसे एक साफ-सुथरा देश मिल सकेगा.
कोई भी मूल्य एवं संस्कृति तब तक जीवित नहीं रह सकती जब तक वह आचरण में नहीं है.

