Docs risking your health with X-rays?

Before prescribing an x-ray, does your physician ask you when you last underwent a radio-diagnostic test? Is he willing to accept test reports done at the suggestion of other doctors?

If your answer to both questions is no, you may be among the growing number of Indians who get unnecessarily exposed to harmful radiation emitted by diagnostic machines. According to guesstimates by industry insiders, demand for x-rays and CT scans have gone up by as much as 50% in the past five years alone (though in the absence of a centralized registry, no concrete figure is available).

This poses a clear danger of radiation over-exposure, especially for seriously ill people who are often asked to repeat all diagnostic tests each time they consult a new expert. The absence of a watchdog or set treatment protocols only makes matters worse. And, believe it or not, doctors often may not have a clue about dangers of exposure.

According to a study done by AIIMS in 2006-07 in Delhi, 80% of physicians were found to be more or less ignorant about the levels of radiation exposure in various radio-diagnostic tests. "When awareness is so little, over-prescribing is inevitable. X-rays are the most over-prescribed test. It is estimated that nearly 100 million x-rays are performed each year in India," said Dr Pratik Kumar, assistant professor, medical physics, AIIMS, who conducted the study. For a person, 1 milli Sievert (mSv) per year radiation exposure is considered within permissible limits. Limited x-ray exposure is considered "safe" since each test results in a 0.02 mSv exposure. "It is safe but should be judiciously prescribed. Any amount of radiation exposure is hazardous though it might not result in cancer or skin burn," said Dr Kumar.

As per the Radiation Protection Act, 2004, all x-ray machines have to be registered with the Atomic Energy Regulatory Board. CT-scan machines too should have an AERB licence. Nearly five years after the Act was revised, AERB is still in the process of registering equipment and says those bought before 2004 are "very difficult to trace". "We have registered more than 35,000 x-ray machines and over 1,000 CT-scan units registered. We will complete the process soon," said S P Aggarwal, director, Radiology Safety Division, AERB. Aggarwal too admits that x-rays and CT-scans are being over-prescribed. "But it is not our job to monitor this aspect. It is an ethical issue and doctors have to be cautious," he said. Medical Council of India (MCI), which has all medical practitioners in India registered with it, says it's not possible to monitor overuse as there are no standard guidelines for treatment of a medical condition.

The health ministry had tabled the Clinical Establishments (Registration and Regulation Bill) in the Lok Sabha in 2007 to bring all clinical facilities under one umbrella. Legislatures of four states (Arunachal, Himachal, Mizoram and Sikkim) have started the move by passing resolutions requesting Parliament to enact a comprehensive law to regulate government and private sector medical services. "The Centre can't force state governments to adopt this Bill, as health is a state subject. We need stringent laws to stop the misuse of these diagnostic facilities. Today, any registered doctor is free to run a pathological laboratory or a radio diagnostic service. There is no minimum requirement imposed by MCI," said Dr C M Gulhati, editor, Monthly Index of Medical Specialities (MIMS-India). But MCI says that it is difficult to monitor over-prescription of these tests. "There is no set rule or guidelines to diagnosis a disease. It has to be left to the physicians to decide how many tests are needed. And the fear of litigation has spoiled the relationship between doctor and patient. Doctors are also human beings and to err is human," said Dr Ketan Desai, president, MCI.
कोई भी मूल्य एवं संस्कृति तब तक जीवित नहीं रह सकती जब तक वह आचरण में नहीं है.

Sonia was 'worst performer' in Lok Sabha

They shout and scream slogans and pull all the right strings to win hearts (read votes) of their electorate, but when it comes to raising the problems of their constituencies in parliament, these political honchos look like laggards. Records show that most high-profile politicians failed to ask questions in parliament and rarely took part in debates over government policies.

The worst performer was Congress chief Sonia Gandhi, who did not ask a single question and took part in only three debates. Similar was the performance of Atal Bihari Vajpayee who took part in only seven debates and did not raise a single issue about his constituency. Due to severe health problems, the former prime minister came to parliament only for 19 days in his five-year term. The performance of another BJP top boss, LK Advani, was also dismal. He didn't ask any question and participated in 55 debates.Mamata Banerjee was too busy fighting CPI(M) in Bengal to attend parliament and was present on only 59 days in five years. JD(S) top boss HD Deve Gowda was also too busy with state politics and solving family disputes. Hence, he came to parliament on 125 days. He did not have time to ask any question and was present for only six debates.
(Gyan Varma)
कोई भी मूल्य एवं संस्कृति तब तक जीवित नहीं रह सकती जब तक वह आचरण में नहीं है.


कोयले की खान में हीरा

अगर मौका मिले तो तिल में ताड़ की ऊंचाई छूने की भरपूर संभावना होती है. ओमप्रकाश, किंसु, कालू, बंटी, अमरलाल ने इसे साबित कर दिखाया है.
ओमप्रकाश भी एक दुबला पतला सा सरकारी स्कूल में पढ़ने वाला लड़का है. जैसे गांव के अमूनन बच्चे शर्मीले होते हैं, वैसा ही ओम प्रकाश भी दिखता है. लेकिन जैसे ही आप उससे बातचीत शुरु करते हैं, आपकी यह धारणा टूट जाएगी. देश-दुनिया को बदलने का उसका जज्बा आप को हैरानी में डाल देगा. उसके साहसिक कारनामों को सुनकर आप भी हमारी तरह ही दांतो-तले उंगली दबा लेंगे. कई देशों की यात्रा कर चुका ओमप्रकाश जैसा दिखता है, दरअसल वैसा है नहीं. हाल ही में वह इटली से दलाई लामा, मिखाइल गोर्वाचोब, बेटी बिलयम और जार्ज क्लूनी जैसी कई और बड़ी हस्तियों को संबोधित करके भारत लौटा है. इतना ही नहीं, बाल अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले ओम प्रकाश को दुनिया के प्रतिष्ठत पुरस्कार इंटरनेशनल चिल्ड्रेन पीस अवार्ड से नवाजा जा चुका है, जिसे बच्चों का नोबल पुरस्कार भी कहा जाता है.

ओमप्रकाश न तो किसी अमीर बाप का बेटा है और न ही किसी पब्लिक स्कूल का छात्र, जहां "पर्सनालिटी डेवलपमेंट" की ट्रेनिंग दी जाती है. अपने बारे में ओम प्रकाश बताता है, "मेरे दादा ने एक जमीनदार से कर्ज लिया था, जिसके एवज में मेरा पूरा परिवार उनके यहां काम करता था. मैं जब पांच साल का था तभी से उनके यहां काम करने लगा था. मैं खेतों में काम करने के साथ साथ उनके पशुओं की भी देखभाल करता था." ओम प्रकाश एक बाल बंधुआ मजदूर था, जो कभी खेतों में काम करता था. जब बाल मजदूरी से बाहर निकल कर उसे पढ़ने और कुछ करने का मौका मिला तो उसने वह कर दिखाया, जिससे लोग हैरत में है. ओम प्रकाश के सामाजिक सरोकार को देखते हुए राजस्थान के राज्यपाल और मुख्यमंत्री भी उसे सम्मानित कर चुके हैं. उसे राजस्थान गौरव के सम्मान से भी सम्मानित किया जा चुका है. अपनी जाति के गूर्जर में तो वह "लायक बेटे" का दर्जा हासिल कर चुका है. ऐसा सम्मान पाने वाला ओमप्रकाश अकेला नहीं है, उसके जैसे और भी बच्चे हैं, जो कभी बाल मजदूर थे या फिर भीख मांगते थे और सड़कों पर कूड़ा बीनते थे. लेकिन उन्हें भी जब पढ़ाई का मौका मिला तो नन्हीं उम्र में उन्होंने भी साबित कर दिया है कि वे दुनिया बदलने का माद्दा रखते हैं. बंटी, अमरलाल, कालू, राकेश सदा, किंसू कुमार और शम्सुर... ऐसे कुछ नाम हैं जो कभी गुमनाम थे, लेकिन आज दुनिया की जबान पर हैं.

राजस्थान के अलवर जिले के सराधना गांव के रहने वाले 16 वर्षीय ओम प्रकाश के खाते में कई उपलब्धियां दर्ज हैं. स्कूल से लौटने के बाद ओम प्रकाश गांवों में निकल जाता है. जहां कहीं भी उसे कोई बच्चा खेतों या ढ़ाबों में काम करता दिख जाता है, वह उसे मुक्त कराने की कोशिश करता है. ओम प्रकाश गांव के लोगों को समझा कर बच्चों और खासकर लड़कियों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करता है. ओम प्रकाश से हमारी मुलाकात राजस्थान की राजधानी जयपुर के पास स्थित विराट नगर के मुक्ति आश्रम में होती है. बाल मजदूरी के खिलाफ काम करने वाली गैर सरकारी संस्था बचपन बचाओं आंदोलन (बीबीए) द्वारा संचालित मुक्ति आश्रम में बाल और बंधुआ मजदूरी करने वाले बच्चों को मुक्त कराकर उन्हें अनौपचारिक शिक्षा व व्यावसायिक प्रशिक्षण तो दिया ही जाता है, साथ ही उनमें समाज और देश के लिए कुछ करने का जज्बा भी पैदा किया जाता है. बंटी, अमरलाल, कालू, राकेश सदा, किंसू कुमार और शम्सुर आदि ने आज जिन बुलंदियों को छूआ है, उसकी बुनियाद यहीं से पड़ी थी. ये बच्चे सामाजिक बुराइयों के खिलाफ अलख जगाए हुए हैं. ओम प्रकाश ने जब अपने ही घर में सामाजिक बुराइयों को पैदा होते देखा तो उसने अपने पिता के खिलाफ ही विद्रोह कर दिया. ओम प्रकाश उस घटना को याद करते हुए बताता है, "करीब दो साल पहले जब मेरे पिता ने मेरी नाबालिक बहन की शादी तय की तो मैंने इसकी खिलाफत की. मेरे पुलिस में इस बारे में रिपोर्ट करने की धमकी पर ही उन्होंने आखिरकार विवाह रद्द किया."

अलवर जिले थानागाजी ब्लाक के 500 बच्चों का जन्म पंजीकरण करा कर ओम प्रकाश ने एक इतिहास भी रचा है. अनपढ़ ग्रामीणों को ओम प्रकाश ने न केवल इसका महत्व बताया, बल्कि साथ ले जाकर पंजीकरण भी कराया. जन्म पंजीकरण प्रमाणपत्र बच्चे की पहचान का ऐसा दस्तावेज है जिसके आधार पर ही उसे सरकारी योजनाओं का लाभ मिलता है. ओम प्रकाश हमेशा सामाजिक बुराइयों के खिलाफ लड़ता रहता है. ओम प्रकाश ने एक बार जब देखा कि सरकारी स्कूल में दाखिले के दौरान बच्चों से विकास शुल्क के नाम पर जबरन पैसा वसूला जा रहा है तो उसने इसकी शिकायत पहले तो प्रधानाचार्य से की, जब प्रधानाचार्य ने इस पर ध्यान नहीं दिया तो ओमप्रकाश ने अभिभावकों से विकास शुल्क की रसीदें इकठ्ठी कर एक रिपोर्ट तैयार की और इसकी शिकायत राजस्थान के मानवाधिकार आयोग से की. आयोग ने जांच में इसे सही पाया और राज्य सरकार को इस पर कार्रवाई करने का आदेश दिया. ओमप्रकाश के मुताबिक, "मानवाधिकार आयोग में शिकायत के चलते स्कूल को अभिभावकों को विकास शुल्क वापस करने के लिए मजबूर होना पड़ा." ओम प्रकाश की इन उपलब्धियों के चलते उसे हेग स्थित नीदरलैंड की संसद में दक्षिण अफ्रीका के पूर्व प्रधानमंत्री और नोबल पुरस्कार विजेता फैडरिक विलयम डी क्लार्क ने 19 नबंबर, 2006 को इंटरनेशनल चिल्ड्रेन पीस अवार्ड देकर सम्मानित किया. पुरस्कार प्रदान करने वाली हालैंड की सामाजिक संस्था किड्स राइट्स पुरस्कृत बच्चे के सम्मान में करीब 45 लाख रूपये बच्चों के लिए काम करने वाली किसी संस्था देती है. ओम प्रकाश अपने स्कूल में बनाई गई बाल पंचायत का निर्वाचित सरपंच भी है.

बिहार के मधेपुरा के मुरोह गांव के आठवीं में पढ़ने वाले बंटी कुमार को हाल ही में पोगो अमेजिंग किड्स अवार्ड (लीडरशिप कैटेगरी) से नवाजा गया है. कभी ईट-भट्टे में काम करने वाले 15 साल के बंटी कुमार को यह पुरस्कार इसलिए दिया गया कि उसने ईट-भट्टे में काम करने वाले अपने गांव के करीब 60 बच्चों को नर्क की जिंदगी से निकाल कर स्कूल का रास्ता दिखाया. बंटी के मुताबिक, "भट्टे से बाल मजदूर के रूप में मुक्त होने के बाद मुझे मुक्ति आश्रम में शिक्षा का महत्व पता चला. यहां से अनौपचारिक शिक्षा लेने के बाद जब मैं गांव गया तो वहां मेरे माता-पिता मेरे स्कूल जाने का विरोध करते थे. लेकिन मैं खुद तो स्कूल जाता ही, साथ में भट्टे पर काम करने वाले गांव के अन्य बच्चों को स्कूल जाने के लिए प्रेरित भी करता. मुक्ति आश्रम में मैने शिक्षा पर कुछ नुक्कट नाटक किए थे. गांव में कुछ बच्चों की टोली तैयार कर मैं लोगों के बीच नुक्कड नाटक करने लगा. इससे लोगों में चेतना आई और वे अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए तैयार हो गए." बंटी का चयन इस प्रतियोगिता में भले ही हो गया था, लेकिन बंटी को आखिर तक उम्मीद नहीं थी कि उसको यह पुरस्कार मिलेगा. बंटी बताता है, "वहां तो सब बड़े-बड़े पब्लिक स्कूल के अंग्रेजी बोलने वाले बच्चे आए हुए थे." बंटी को जब यह पुरस्कार मिला तो उसे घरों और भट्टों पर काम करने वाले बच्चे बहुत याद आए. पोगो किड्स अवार्ड मिलने के बाद जब बंटी को सम्मानित करने आमिर खान पहुंचे तो बंटी एक गुजारिश सुन कर दंग रह गए. बंटी के मुताबिक, "मैने आमिर खान से बाल मजदूरी करने वाले बच्चों पर एक फिल्म बनाने की बात कही की और आमिर खान ने मुझसे ऐसी फिल्म बनाने का बादा भी किया." बंटी को पोगो अवार्ड में जो पांच लाख रूपये मिले हैं उन्हें भी वह अपने ऊपर नहीं, गरीब बच्चों के उत्थान के लिए खर्च करना चाहता है. बंटी की आखों में एक ऐसे समाज का सपना है जहां कोई गरीब और भूखा न रहे. यही वजह है कि बंटी बडा होकर समाजसेवी बनना चाहता है.

तेरह साल का किंसू कुमार... हंसी और ठहाकों से तो उसका चोली-दामन का साथ है. उसकी जिंदादिली को देखकर नहीं लगता कि कभी वह उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में जीप पर खलासी का काम करता रहा होगा. पढ़ने में होनहार किंसू ने सातवीं में स्कूल में प्रथम स्थान प्राप्त किया है. किंसू की प्रतिभा को देखकर लोग हैरान हो जाते हैं. वह जापानी दल भी किंसू की प्रतिभा का कायल हो गया था, जो भारत में बाल मजदूरी पर शोध करने आया था. किंसू को बाल मजदूरी से संबंधित सारे नियम-कानून रटे पड़े हैं. वह जितनी अच्छी तरह से क्रांतिकारी गीत गाता है उतनी अच्छी तरह से नुक्कड नाटकों में अभिनय भी करता है. उसकी इसी प्रतिभा को देखते हुए उसे अमेरिका के वाशिंटन में संपन्न हुए ग्लोबल कंपेन फार एजुकेशन के सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए खासतौर से आमंत्रित किया गया था. जहां उसने अमेरिकी सीनेटर, दुनिया कई देशों के शिक्षा मंत्रियों व सासंदों और शिक्षाविदों को संबोधित भी किया. सम्मेलन में आए ब्रिटेन के प्रधानमंत्री गार्डेन ब्राउन भी किंसू के मुरीद हो गए. अपने स्वभाव के मुताबिक मुस्कराते हुए किंसू कहता है, "मैं वहां सभी देशों के शिक्षा मंत्रियों से अपील की की वे लोग अपना शिक्षा का बजट बढ़ाएं.ताकी सभी बच्चों को मुफ्त शिक्षा मिल सके." कभी कूड़ा बीनने और मध्य प्रदेश के शिवपुरी की पत्थर खदानों में काम करने वाला अमर लाल यूनेस्कों की "सभी के लिए शिक्षा" (एजूकेशन फार आल) के मकसद से बनाई गई उच्च स्तरीय समिति (हाई लेबल कमेटी) का सदस्य है. वह इस मिटिंग में हिस्सा लेने सेनगल गया था. वह वकील बन कर लोगों को न्याय दिलाना चाहता है.

सोलह साल का कालू कारपेट बुनता था, लेकिन वह अब भविष्य के सपने बुन रहा है. बचपन के दिनों में जब उसके खेलने खाने के दिन थे, तब उसकी नन्हीं उंगलियां कारपेट के धांगों से खेलने के लिए मजबूर थी. अंधेरी कोठरी में लंबे समय तक काम करने से उसका रंग काला पड़ गया और नाम पड़ गया कालू. कालू आज बाल दासता का प्रतीक बन गया है. खैर, इस समय वह पढ़ लिख कर अपनी किस्मत संवारने में लगा है. वह नौवीं कक्षा का होनहार छात्र है. अपनी अदम्य जिजिविषा के लिए चर्चित कालू को 1999 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने भोज पर आमंत्रित किया था. बाल मजदूरी के खिलाफ बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने की वजह से कालू को जर्मनी की प्रसिद्ध गैर सरकारी संस्था ब्रेड फार द वर्ल्ड ने कालू को उन पचास लोगों की सूची में शामिल किया है जो दुनिया को बदलने में जुटे हुए हैं.

ओम प्रकाश, बंटी, अमर लाल, किंसू और कालू....एक उम्मीद हैं. जो लोग समाज बदलने और दुनिया से गरीबी मिटाने में जुटे हुए हैं उनके लिए ये एक मिसाल भी हैं. इन बच्चों ने साबित किया है कि अगर समाज के हाशिए पर खड़े उन बच्चों को, जिन्हें पेट भरने के लिए मजदूरी करनी पड़ रही है, उन्हें भी शिक्षा और ज्ञान का अवसर मिले तो दूसरों के मुकाबले वे कहीं बेहतर कर सकते हैं. उनका जो सामाजिक सरोकार हमें दिखा है, वह शिक्षा के तथाकथिक आधुनिक संस्थानों और मंहगें पब्लिक स्कूलों के बच्चों में दिखाई नहीं देता. इस मामले में ये "स्ट्रीट चिल्ड्रेन" सभ्य समाज के हाइटेक "स्मार्ट चिल्ड्रेन" पर कहीं भारी पड़ते हैं.

(अनिल पाण्डेय)
कोई भी मूल्य एवं संस्कृति तब तक जीवित नहीं रह सकती जब तक वह आचरण में नहीं है.

'जंगली' की जिद का जंगल

वन विभाग और विज्ञान दोनों का दावा था कि इतनी ऊंचाई पर हरियाली की बात सोचना ही अवैज्ञानिक किस्म की सोच है. कुछ वनस्पतियां यहां जरूर उग सकती हैं लेकिन जंगल जैसी बातें इतनी ऊंचाई पर संभव नहीं है. लेकिन जंगली ने वह कर दिखाया जो पूरा सरकारी महकमा मिलकर नहीं कर सका. और जो किया उसका प्रसाद आज अकेले जगत सिंह को नहीं मिल रहा है. हरियाली और संपन्नता का प्रसाद समाज के हर हिस्से तक पहुंच रहा है निशुल्क और साधिकार.

जगत सिंह ने गढ़वाल में इतने पेड़ लगाये कि लोगों ने आदर से उन्हें जंगली का संबोधन दे दिया. जगत सिंह चौधरी ‘जंगली’ नें साबित किया है कि यदि कोई व्यक्ति अपने मन में ठान ले तो वह बहुत से तथाकथित वैज्ञानिक बातों को भी झुठला सकता है. उत्तराखण्ड के गढ़वाल इलाके में रूद्रप्रयाग जिले के एक छोटे से गांव कोटमल्ला में रहने वाले जगत सिंह चौधरी अब अपने उपनाम ‘जंगली’ के नाम से ही ज्यादा जाने जाते हैं. जगत सिंह चौधरी का जन्म 6 अप्रैल 1954 को कोटमल्ला में हुआ था. तब यह गांव चमोली जिले के अंतर्गत आता था.अब यह रुद्रप्रयाग जिले में है. जंगली के परदादा साधु सिंह और दादा शेर सिंह प्रकृति प्रेमी थे.उनके दादा शेर सिंह अपने जमाने में जंगलों के प्रति अपने लगाव के लिये प्रसिद्ध थे जिसके लिये ब्रिटिश सरकार ने ‘वाकसिद्धि’ की उपाधि दी और पांच रुपये मासिक की पेंशन भी मुहैया करवायी. सन 1967 में जंगली सेना में भर्ती हो गये.शादी हुई,बच्चे हुए और जगत सिंह का जीवन भी आम लोगों की तरह चलने लगा. उनके जीवन में परिवर्तन आया 1974 में जब उनके पिता बहादुर सिंह की मृत्यु हुई.मरते समय उनके पिता ने उनसे कहा कि वह अपनी बंजर पड़ी जमीन को किसी ना किसी तरह से प्रयोग में लायें. उस जमीन में तब कुछ भी नहीं उगता था और उस इलाके में पानी की बहुत कमी थी.जगत सिंह ने पहले उस इलाके में प्राकृतिक वनस्पति उगायी ताकि किसी तरह पानी को रोका जा सके और भूमि के क्षरण को कम किया जा सके. जगत सिंह हर साल अपनी सालाना छुट्टी में अपनी जमीन में लगे रहते. उनकी मेहनत के परिणाम धीरे धीरे आने लगे. सन 1980 में जगत सिंह ने फौज की नौकरी छोड़ दी और वहां से मिले अधिकतर पैसे को उन्होने अपनी जमीन में लगा दिया. उनकी मेहनत का ही परिणाम था उस इलाके में एक भरा-पूरा जंग़ल बन गया,पानी के सोते फूट गये और उबड़-खाबड़ जमीन जिसे कोई देखता भी नहीं था, उसे एक जीवन्त जंगल बनाकर वह स्वयं जंगली बन गये.

इस जंगल को बनाने में जंगली ने जहां काफी मेहनत की वहीं उन्होने लीक से हटकर चलते हुए पुरानी मान्यताओं और तथाकथित वैज्ञानिक सोच को भी चुनौती दी. 4500 फुट की उंचाई में स्थित इस इलाके में माना जाता था कि यहां केवल कुछ ही वनस्पतियां उगायी जा सकती हैं. यहां तक कि वन विभाग का भी यही मानना था कि कुछ प्रजातियों को छोड़ इस इलाके में कुछ भी नहीं उगाया जा सकता.वन विभाग मानता है कि जहां चीड़ का जंगल हो वहां दूसरी किसी प्रजाति का फलना-फूलना संभव नहीं है.जगत सिंह ने मिश्रित वन की अवधारणा को जन्म दिया. उनका मानना है कि कि जंगल में सब कुछ उगाया जाना चाहिये जिससे चारे के लिये घास मिले, खाने के लिये फल मिलें, दवाइयों के लिये जड़ी बूटियां मिलें, नगदी कृषि फसलें अदरख, हल्दी, चाय पैदा हों और इमारतों के लिए तथा जलाने के लिये लकड़ी भी मिले. यह सब उन्होने अपने जंगल में,बिना कोई किताब पढ़े,बिना किसी प्रशिक्षण व मार्ग दर्शन के, सिर्फ अपनी मेहनत के बल पर कर भी दिखाया. उनके जंगल में आज बांज, चीड़, देवदार, बांस, सुरई, आंगू, तुन, खड़िक, अशोक, कपूर, भीमल, तिमिल, शीशम, काफल आदि एक साथ पैदा होते हैं. 56 से भी अधिक प्रजातियों के वृक्षों को उन्होने अपने जंगल में उगा कर दिखा दिया कि कभी कभी केवल किताबी ज्ञान व्यवहारिक ज्ञान के आगे बौना सिद्ध हो जाता है. उन्होने अपने जंगल में कई जड़ी बूटी जैसे कौतुकी, बेलादोन्ना, बज्रदंती आदि भी उगायी हैं. जबकि माना जाता है इस ऊंचाई में जड़ी बूटियों का पनपना नामुमकिन है.

‘जंगली’ के जंगल का परिणाम है कि उस इलाके में पानी के दो स्रोत फूट निकले हैं जिससे उस गांव के लोगों की पानी की समस्या कम हो गयी है.अपनी मिश्रित वन की अवधारणा स्पष्ट करते हुए ज़ंगली कहते हैं कि एक जंगल में सभी तरह के पेड़ होने चाहिये जैसे वो पेड़ जो जमीन को नमी प्रदान करते हैं जैसे बांज, काफल, अयार, बुरांस-ये जमीन की नमी को बरकरार रखते हैं और इनकी पत्तियां झड़ने पर खाद के रूप में वृक्षों को पोषित करती हैं. इसी तरह से फलों के वृक्ष होने चाहिये जो अपने जीवन काल में फल प्रदान करें और बाद में उनकी लकड़ी इमारतों के काम भी आ सके. इसी तरह से सबसे महत्वपूर्ण है कि पर्यावरण को स्वच्छ रखने के लिये चौड़ी पत्तियों वाले वृक्ष भी जंगल में हों. ओद्योगिक इकाइयों के लिये आप को कुछ वृक्ष लगाने चाहिये जैसे रामबांस , बांस , रिंगाल , केन आदि. उसी तरह से आपको चारे के लिये घास और लताओं को भी जंगल में लगाना चाहिये. ‘जंगली’ जैवीय विविधता के पक्षधर हैं.

पर्यावरण की बात करने वाले आज अधिकांश लोग वह हैं जिन्होने पर्यावरण को नजदीक से देखा भी नहीं है. आज आवश्यक है कि हम बड़ी बड़ी बातें करने के स्थान पर अपनी मेहनत लगन और दृढ़ संकल्प से वह कर दिखायें जो जगत सिंह ने किया है. आवश्यकता इस बात की भी है कि जगत सिंह जंगली की अवधारणा का विस्तार हो और पहाड़ और पर्यावरण को चलाने की योजनायें केवल कागजों में ही ना बने बल्कि उन को अमलीजामा भी पहनाया जाये. जो ‘जंगली’ ने कर दिखाया है उस मॉडल को उत्तराखंड और देश के अन्य क्षेत्रों में भी फैलाया जाय ताकि आने वाली पीढियां जंगल को केवल किताबों में ही ना देखें बल्कि उसे वास्तव में महसूस भी कर सके.

(काकेश कुमार)

कोई भी मूल्य एवं संस्कृति तब तक जीवित नहीं रह सकती जब तक वह आचरण में नहीं है.


पाठशाला से समाजशाला तक

शाम ढल गई लेकिन पारदी गानों की धुन पर बच्चों का थिरकना जारी रहा. चलते वक्त क्लास पहली के कुछ बच्चो ने घेर लिया. उनमें से दीपक शिंदे ने कहा- ''हमारी एक कविता तो सुनते जाओ.” हमने कहा - ''कौन-सी ?'' वह बोला-''सूरज को तोड़ने जाना है''. हमने कहा-''अगली बार, तोड़ कर सुनाना.''

तीसरी कक्षा में पढ़ने वाली ललिता, सीमा और वैशाली स्कूल लगने के एक घण्टे पहले ही पहुंच गई हैं और स्कूल की सीढी पर खड़ी ललिता आज का जो पाठ पढ़ा रही है, उसे नीचे बैठी सीमा और वैशाली लिख रही हैं. तीनों अपने-अपने काम में इतनी मगन हैं कि उन्हें अपने अपने आस पास का भी ध्यान नहीं है. लेकिन उनके आस पास के लोग बड़े ध्यान से यह दृश्य देख रहे हैं.
यूं तो यह दृश्य बहुत साधारण लगता है लेकिन ऐसा है नहीं. अ
सल में हम जिस स्कूलकी बात कर रहे हैं, वह पारदी जनजाति का स्कूल है. पारदी यानी मिथ, इतिहास,सामाजिक परंपरा और कानून के मकड़जाल में फंसी हुई एक ऐसी जनजाति, जिसकेलिए इस तरह के दृश्य सच में दुर्लभ हैं. ऐसे में स्थानीय लोगों के लिए यहस्कूल किसी अचरज से कम नहीं है.अंग्रेजों ने पारदी जनजाति को “ अपराधिकजनजाति अधिनियम, 1871 ” के तहत सूचीबद्ध किया था. अंग्रेज चले गए मगरधारणा बनी रही. इसलिए आज भी पारदी बस्तियां गांव से कोसों दूर जंगलों मेंहोती हैं. कोई रास्ता इन बस्तियों को नहीं जाता. न ही सरकार की कोई योजनायहां आती है. न बिजली, न पानी, न राशन और न ही स्वास्थ्य की सुविधा. इसलिएयहां के लोग कहते हैं कि आजादी के 60 सालों में सरकार ने हमें एक ही चीज दी है, और वहै– महादेव बस्ती का यह स्कूल.

तहसील मुख्यालय क्लब से 15 किलोमीटर दूर, पहाड़ी के नीचे गिनती के 60 घर हैं जिनमें 279 लोग रहते हैं. इनके दिलों से शासन की दहशत कुछ कम तो हुई है लेकिन पूरी तरह से गई नहीं. तभी तो हमारी गाड़ी देखते ही ज्यादातर लोग लापता हो गए. उन्हें लगा कि आसपास कोई वारदात हुई होगी जिसकी छानबीन के लिए पुलिस आई है. कुछ देर बाद ‘ अपनेवाले हैं ’, ऐसा कहकर लोग एक जगह जमा होने लगे. हम जिस जगह मिले वह बस्ती की एकमात्र पक्की बिल्डिंग स्कूल है. बोर्ड पर स्कूल बनने का साल (1998), बच्चों की कुल संख्या (27), लड़कियां (10) और लड़के (17) लिखा है. एक बड़े हॉल से होकर 2 कमरे खुलते हैं जिसमें 1 से 4 तक की कक्षाएं लगती हैं.

स्कूल का कार्यालय और उसके पीछे बाथरूम है. लेकिन 30 गुणा 60 फीट वाले इस स्कूल की पूरी तस्वीर तब बनी जब लोगों से मालूम हुआ कि दो सालों से यहां का परीक्षाफल 100 प्रतिशत रहा है और यह हर नज़र से जिले के बेहतर स्कूलों में गिना जाता है. गांव के सुबराराव शिंदे ने याद करते हुए कहा– “इसके पहले तो पुलिस के छापे ज्यादा लगते थे. इसलिए कोई शिक्षक आने की हिम्मत नहीं करता था. तब स्कूल था, पढ़ाई नहीं. अगर शिक्षक आते भी तो बच्चे नहीं होते. वे इधर उधर खेलते रहते और शिक्षकों को “ओ मास्टर” कहकर चिढ़ाते थे. हमें लगता कि इस स्कूल के बहाने पुलिस बस्ती पर निगाह रखती है.” फिर पहल की एक सामाजिक संस्थान ने. लोकहित सामाजिक विकास संस्था ने जब यहां कदम रखा तो कई मुश्किलों का सामना किया. संस्था के बजरंग टाटे ने बताते हैं- “ ये हमें पुलिस के दोस्त समझते. पूछने पह अपना नाम सलमान या शाहरुख बताते और फोटो तो बिल्कुल नहीं खिंचवाते. सभी साल में कई बार `कारन’ नाम का त्यौहार मनाते. सारा समय बच्चों को स्कूल बुलाने में ही चला जाता. हम पारदी जनजाति के बीच काफी समय से काम करते आ रहे हैं इसलिए पुराना तजुर्बा काम आया.”गांव के कल्याण काले के अनुसार संस्था के लोगों ने पहले गांव वालों के साथ ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताया. इससे गांव वालों के अंदर का डर दूर होने लगा. बातों ही बातों में गांव के लोगों ने जाना कि पढ़ाई कितनी जरूरी है. तब पढ़ाई में आने वाली अड़चनों पर घंटों बातचीत होती.बजरंग टाटे बताते हैं– “फिर 60 परिवारों के 135 महिला और 149 पुरुषों को लेकर एक सर्वे किया. समाज में शाला का मॉडल बनाया और 2007 को `समाजशाला’ बनी. समाजशाला के बारे में शिक्षिका प्रतिभा दीक्षित के अनुसार इस स्कूल का पाठ्यक्रम सरकारी ही है. जिसे पूरा करने के दो शिक्षकों को रखा गया है. बच्चों को पढ़ाई के अलावा दूसरी रोचक गतिविधियों में शामिल करने के लिए एक कार्यकर्ता और दोनों शिक्षकों को विशेष प्रशिक्षण दिया गया.स्कूल के दूसरे शिक्षक संजय तांबारे बताते हैं- “पहले-पहल बच्चों के साथ खास दिक्कत यह रही कि इन्हें पारदी ही बोलनी आती थी, जो हमें नहीं आती थी. तब एक दूसरे को समझने के लिए खेल, गाने, चित्रों और कई चीज़ों का इस्तेमाल किया गया. धीरे-धीरे बच्चे मराठी, हिंदी और अंग्रेजी के पाठ भी सीखने लगे.” सुनिदि शिंदे से मालूम हुआ कि स्कूल की ताकत उसकी `समिति’ है जिसे बस्ती की औरतें संभालती हैं. यही बच्चों की हाजिरी, उनकी पढ़ाई-लिखाई और दोपहर के भोजन का ध्यान रखती हैं. यहां औरतों का अलग से एक समूह है, जिसमें सभी हर महिने 50 रुपए जमा करती हैं. यह रकम बच्चों पर खर्च होती है.समाजशाला से समनव्यक विठ्ठल खंडागले ने स्कूल में बिजली, शौचालय, मैदान और मैदान पर बने ब्लैकबोर्ड को युवा टोली की मेहनत का नतीजा बताया. इस युवा टोली में अठारह से तीस साल के युवा अगस्त में एक मेला लगाकर अफसरों के अलावा नेताओं को भी बुलाते हैं. इस साल जिला परिषद अध्यक्षा गोदावरे केंद्रे ने बस्ती में बिजली, पानी और पक्की सड़क बनाने का वादा किया है. इसी तरह उपविभागीय पुलिस अधीक्षक विजय महाले ने पारदी समाज के मन में पुलिस के डर को दूर करने के लिए कार्यशाला रखी थी. इसके अलावा प्राइमरी हेल्थ सेंटर, इडकुर' के डॉक्टर हर महीने हेल्थ कैम्प लगाकर बच्चों के साथ-साथ बस्ती के दूसरे लोगों की भी जाँच करने लगे है. हमारी अगली मागों में हैं लडकियों के लिए अलग से बाथरुम, वाचनालय और कैम्पस की दीवार बनवाना.

दिसम्बर 2007 को महादेव बस्ती ने अपनी जाति-पंचायत में जो फैसला लिया उस पर जिले के कई लोगों को यकीन नहीं हुआ. उस दिन पूरी बस्ती एकमत हुई कि अगर हमारा बच्चा, हमारी गलती से स्कूल नहीं जाता तो हम इसका आर्थिक जुर्माना देंगे.जो बस्ती शिक्षा के दीपक से दूर रही थी, उसी बस्ती के बच्चों के लिए उनके माता-पिता ने पढ़ाई-लिखाई का यह मतलब जाना था. तब से स्कूल में बच्चों की 100 प्रतिशत उपस्थिति दर्ज होने लगी और एक भी बच्चा ड्रापआउट नहीं हुआ. प्रधानाध्यापक राम डाहवे ने खुशी जाहिर करते हुए कहा - ''इसकी तारीफ तो कलेक्टर भी करते हैं. समय के साथ शिक्षा भी बदल रही है जैसे अब हर काम कम्प्यटूर पर होने लगा है. वैसे तो इस इलाके के कई स्कूलों में कम्प्यटूर नहीं पहुचें लेकिन 'लोकहित' ने इस साल यहां दो कम्पयूटर दिए हैं बच्चे इन्हें ठीक से चलाने लगे हमारी कोशिश अब यही रहेगी''. 'चाईल्ड राइटस् एण्ड यू’ के महाप्रबंधक कुमार नीलेन्दु के मुताबिक - ''देशभर में एक समान स्कूल व्यवस्था लागू करने के लिए आंदोलन चल रहा है.

यह स्कूल इस दिशा में एक मिसाल है. निशुल्क और बेहतर शिक्षा देने की राह में एक समान स्कूल व्यवस्था सही कदम है. अगर पारदी बस्ती के अंदर एक स्कूल इतना बदलाव कर सकता है तो दूसरी बस्तियों के सरकारी स्कूल क्यों नही.'' लेकिन ये कोशिशें काफी नहीं हैं.इस बस्ती के लोग गांव से बाहर होने के कारण वोटरलिस्ट से छूट जाते हैं. इनके घर की जमीन भी इनकी नहीं होती. 6 से 10 महीनों के लिए गन्ना काटने चले जाते हैं. कुछ मुबंई का रूख करते हैं तो उनके साथ बच्चे भी होते हैं. कई बार बच्चे ट्रेफिक सिग्नलों से होते हुए माफिया की दुनिया में दाखिला लेते हैं. हमें लगा मीडिया में आए दिन इनके जिन करनामों का रहस्योद्घाटन होता है, उनमें सामाजिक परतें दबी की दबी रह जाती है. खबरें खटाखट गुजर जाती हैं. फुलादेवी (बदला नाम) ने बताया कि- ''पुलिस की ज्यादतियां रूकी नही हैं. आसपास कोई चोरी हुई नहीं कि वह यहां आ धमकती है. फिर भी हमारे बच्चे समय के पहले स्कूल पहुचंते हैं.'' हमने उनसे इतना ही कहा ''बदलाव की यह आदत रहनी चाहिए.'' लेकिन क्लास 4 के बाद यह आदत रह पाएगी या नहीं कोई नहीं जानता. क्योंकि क्लास 5 के लिए यहां से 5 किलोमीटर दूर इटकुर जाना होगा. इस बस्ती से दूर जाने से बच्चे तो क्या, बड़े भी डरते हैं. वैसे इस जनजाति ने अपनी कई खूबियों को बचाकर रखा था, जो हमने उनके रहन-सहन और स्कूल में बने लोकचित्रों से जाना. शाम ढल गई लेकिन पारदी गानों की धुन पर बच्चों का थिरकना जारी रहा. चलते वक्त क्लास पहली के कुछ बच्चो ने घेर लिया. उनमें से दीपक शिंदे ने कहा- ''हमारी एक कविता तो सुनते जाओ. ”हमने कहा - ''कौन-सी ?'' वह बोला-''सूरज को तोड़ने जाना है''. हमने कहा-''अगली बार, तोड़ कर सुनाना.''

(शिरीष खरे)


कोई भी मूल्य एवं संस्कृति तब तक जीवित नहीं रह सकती जब तक वह आचरण में नहीं है.

शहीदों का यह कैसा सम्मान?

इंडिया गेट पर जिन सिपाहियों के नाम दर्ज हैं उनमें से ज्यादातर ब्रिटिश हुकूमत की ओर से अफगानों से लड़ते हुए मारे गये थे. उनकी ही याद में ब्रिटिश हुकूमत ने एक स्मारक बनाने का निर्णय लिया था. इंडिया गेट की नींव १० फरवरी १९२१ को डाली गयी थी. जिस साल भारतीय आजादी के तीन सपूतों राजगुरू, सुखदेव और भगत सिंह को फांसी दी गयी उसी साल १९३१ में इन शहीदों के हत्यारे लार्ड इरविन ने इण्डिया गेट को राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा दे दिया था.

तीसरा स्वाधीनता आंदोलन चलानेवाले अक्सर लोगों से यह सवाल करते हैं कि क्या आपको पता है कि इंडिया गेट किसकी याद में बना है? उन लोगों से हमेशा एक ही जवाब मिलता है- भारतीय शहीदों की याद में. फिर इसके बाद कोई सवाल नहीं होता बल्कि जानकारी होती है कि क्या आपको पता है कि यह इंडिया गेट पहले विश्वयुद्ध में अंग्रेजी साम्राज्य की रक्षा करते हुए मारे गये सिपाहियों की याद में बना है तो हर कोई भौंचक रह जाता है. इंडिया गेट पर जितने भी नाम उकेरे गये हैं उनमें से एक भी नाम भारतीय स्वाधीनता आंदोलन से नहीं जुड़ा है. स्वाधीनता आंदोलन से क्या जुड़ेगा, जिनका नाम अंकित है वे लोग तो स्वाधीनता के सिपाहियों से लड़नेवाले लोग थे. लेकिन साठ साल बीत जाने के बाद भी इंडिया गेट हमारी आजादी का प्रतीक बनकर सीना ताने खड़ा है. सेना के तीनों अंग वहां हर साल सलामी देते हैं, और उन सिपाहियों को अपना सिर झुकाते हैं जो अंग्रेजी साम्राज्य की रक्षा में बलिदान हुए थे.

अपनी इसी एकसूत्रीय मांग के साथ तीसरा स्वाधीनता आंदोलन के कार्यकर्ता लोगों को जागरूक कर रहे हैं कि आजादी अधूरी है. इसे पूरा करने की शुरूआत उसी इंडिया गेट से करनी चाहिए जिसे हमारी आजादी और बलिदान का प्रतीक बताया जाता है. इसी सिलसिले में दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में हाल में ही एक राष्ट्रीय विमर्श रखा गया था जिसमें देश के विभिन्न संगठनों के लोग शामिल हुए. इसमें हर विचारधारा के लोग थे. आर्य समाज से भी लोग आये थे तो सीपीआई (एमएल) के लोग भी थे. सबकी साझी चिंता यही थी कि आजादी के बाद भारत में गलत प्रतीकों को राष्ट्रीयता का आधार बनाया गया. राष्ट्रगीत से लेकर राष्ट्रीय प्रतीक तक सबकुछ विवादास्पाद है और कहीं न कहीं अंग्रेजों के प्रभुत्व को ही स्थापित करती है.

इंडिया गेट पर जिन सिपाहियों के नाम दर्ज हैं उनमें से ज्यादातर अफगानों से लड़ते हुए मारे गये थे. उनकी ही याद में ब्रिटिश हुकूमत ने एक स्मारक बनाने का निर्णय लिया था. इंडिया गेट की नींव १० फरवरी १९२१ को डाली गयी थी. जिस साल भारतीय आजादी के तीन सपूतों राजगुरू, सुखदेव और भगत सिंह को फांसी दी गयी उसी साल १९३१ में इन शहीदों के हत्यारे लार्ड इरविन ने इण्डिया गेट को राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा दे दिया था. उसने उस समय कहा था कि यह साम्राज्य के वफादार भारतीयों की निशानी है. और आज ५९ साल बीत जाने के बाद भी हम इस इण्डिया गेट को शहीदों का स्मारक मानकर बैठे हुए हैं. १९७१ में भारतीय सिपाहियों की याद में अमर जवान ज्योति को भी यहीं स्थापित कर दिया गया. तीसरा स्वाधीनता आंदोलन के राष्ट्रीय संगठक गोपाल राय सवाल करते हैं - " क्या आजाद भारत के पास इतनी भी जमीन नहीं थी कि वह युद्ध में शहीद हुए अपने जवानों के लिए अलग से स्मारक बना सकती तो उसने साम्राज्य के वफादारों के नीचे उनकी ज्योति जला दी? क्या हमारा सिपाही किसी साम्राज्य के लिए अपनी जान न्यौछावर करता है या फिर गणतंत्र के लिए?"

१७५७ से लेकर १९४७ तक जिन अनाम लोगों ने भारत की आजादी के लिए अपने प्राण न्यौछावर किये हैं उनका स्मरण दिलानेवाला कोई भी प्रतीक हमारे पास नहीं है. उन अनाम शहीदों को याद करने के नाम पर हम साम्राज्य समर्थक सिपाहियों को अपना श्रद्धासुमन अर्पित कर आते हैं.

तीसरी आजादी से जुड़े लोग मानते हैं कि देश में आजादी के लिए संघर्षों का दो दौर चला है. लेकिन अभी तीसरा दौर चलना बाकी है क्योंकि आजादी के लिए संघर्ष लगातार चलता रहता है. जब इतिहास का एक चक्र पूरा होता है तो दूसरे की शुरूआत हो जाती है. आजादी का संघर्ष कुछ मूल्यों को पैदा करता है और जब संघर्ष का एक दौर खत्म होता है तो अगले दौर में वे मूल्य मार्गदर्शक होते हैं. उन मूल्यों को स्थापित करनेवाले और उनके लिए जीवन लगानेवाले देशभक्त तथा उन मूल्यों को अमर बनानेवाले शहीद होनेवाले लोग ही आदर्श होते हैं. गोपाल राय कहते हैं "अगर आप अपने देश से मुहब्बत करते हैं और देश को नयी साम्राज्यवादी गुलामी से बचाना चाहते हैं और हर हाथ को काम, हर व्यक्ति को सम्मान तथा पूर्ण आजाद तथा विकसित भारत का निर्माण करना चाहते हैं तो आपको साम्राज्यवादी लूट और जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा के आधार पर आपसी फूट पैदा करनेवाली हर साजिश को नाकाम करना होगा."

अपने इसी अभियान के तहत तीसरा स्वाधीनता आंदोलन २१ जनवरी से दिल्ली में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल करने की घोषणा कर चुका है, ताकि इंडिया गेट को सही अर्थों में राष्ट्रीय स्मारक बनाया जा सके और वहां शहीदों के लिए उनका अपना राष्ट्रीय स्मारक बनाया जाए जिसे सलाम करके हर भारतवासी गौरव का अनुभव कर सके.
(www.visfot.com से साभार)
कोई भी मूल्य एवं संस्कृति तब तक जीवित नहीं रह सकती जब तक वह आचरण में नहीं है.