What Islam Isn't

The following is adapted from Dr. Peter Hammond's book: Slavery, Terrorism and Islam: The Historical Roots and Contemporary Threat:

Islam is not a religion nor is it a cult. It is a complete system.

Islam has religious, legal, political, economic and military components. The religious component is a beard for all the other components.

Islamization occurs when there are sufficient Muslims in a country to agitate for their so-called 'religious rights.'

When politically correct and culturally diverse societies agree to 'the reasonable' Muslim demands for their 'religious rights,' they also get the other components under the table. Here's how it works (percentages source CIA: The World Fact Book (2007)).

As long as the Muslim population remains around 1% of any given country they will be regarded as a peace-loving minority and not as a threat to anyone. In fact, they may be featured in articles and films, stereotyped for their colorful uniqueness:

United States -- Muslim 1.0%
Australia -- Muslim 1.5%
Canada -- Muslim 1.9%
China -- Muslim 1%-2%
Italy -- Muslim 1.5%
Norway -- Muslim 1.8%

At 2% and 3% they begin to proselytize from other ethnic minorities and disaffected groups with major recruiting from the jails and among street gangs:

Denmark -- Muslim 2%
Germany -- Muslim 3.7%
United Kingdom -- Muslim 2.7%
Spain -- Muslim 4%
Thailand -- Muslim 4.6%

From 5% on they exercise an inordinate influence in proportion to their percentage of the population.

They will push for the introduction of halal (clean by Islamic standards) food, thereby securing food preparation jobs for Muslims. They will increase pressure on supermarket chains to feature it on their shelves -- along with threats for failure to comply. ( United States ).

France -- Muslim 8%
Philippines -- Muslim 5%
Sweden -- Muslim 5%
Switzerland -- Muslim 4.3%
The Netherlands -- Muslim 5.5%
Trinidad &Tobago -- Muslim 5.8%

At this point, they will work to get the ruling government to allow them to rule themselves under Sharia, the Islamic Law. The ultimate goal of Islam is not to convert the world but to establish Sharia law over the entire world.

When Muslims reach 10% of the population, they will increase lawlessness as a means of complaint about their conditions ( Paris --car-burnings). Any non-Muslim action that offends Islam will result in uprisings and threats ( Amsterdam - Mohammed cartoons).

Guyana -- Muslim 10%
India -- Muslim 13.4%
Israel -- Muslim 16%
Kenya -- Muslim 10%
Russia -- Muslim 10-15%

After reaching 20% expect hair-trigger rioting, jihad militia formations, sporadic killings and church and synagogue burning:
Ethiopia -- Muslim 32.8%

At 40% you will find widespread massacres, chronic terror attacks and ongoing militia warfare:

Bosnia -- Muslim 40%
Chad -- Muslim 53.1%
Lebanon -- Muslim 59.7%

From 60% you may expect unfettered persecution of non-believers and other religions, sporadic ethnic cleansing (genocide), use of Sharia Law as a weapon and Jizya, the tax placed on infidels:

Albania -- Muslim 70%
Malaysia -- Muslim 60.4%
Qatar -- Muslim 77.5%
Sudan -- Muslim 70%

After 80% expect State run ethnic cleansing and genocide:

Bangladesh -- Muslim 83%
Egypt -- Muslim 90%
Gaza -- Muslim 98.7%
Indonesia -- Muslim 86.1%
Iran -- Muslim 98%
Iraq -- Muslim 97%
Jordan -- Muslim 92%
Morocco -- Muslim 98.7%
Pakistan -- Muslim 97%
Palestine -- Muslim 99%
Syria -- Muslim 90%
Tajikistan -- Muslim 90%
Turkey -- Muslim 99.8%
United Arab Emirates -- Muslim 96%

100% will usher in the peace of 'Dar-es-Salaam' -- the Islamic House of Peace -- there's supposed to be peace because everybody is a Muslim:

Afghanistan -- Muslim 100%
Saudi Arabia -- Muslim 100%
Somalia -- Muslim 100%
Yemen -- Muslim 99.9%

Of course, that's not the case. To satisfy their blood lust, Muslims then start killing each other for a variety of reasons.

'Before I was nine I had learned the basic canon of Arab life. It was me against my brother; me and my brother against our father; my family against my cousins and the clan; the clan against the tribe; and the tribe against the world and all of us against the infidel. – Leon Uris, 'The Haj'

It is good to remember that in many, many countries, such as France, the Muslim populations are centered around ghettos based on their ethnicity. Muslims do not integrate into the community at large. Therefore, they exercise more power than their national average would indicate.

(With thanks from www.frontpagemagazine.com)
कोई भी मूल्य एवं संस्कृति तब तक जीवित नहीं रह सकती जब तक वह आचरण में नहीं है.

बदहाल और कंगाल पश्चिम बंगाल

औद्योगिक विकास में फिसड्डी, काम का मौका उपलब्ध करवाने में नाकाम, कुल खेती का ४९ प्रतिशत अभी भी केवल भगवान भरोसे, राज्य के लोगों की आय राष्ट्रीय आय के मुकाबले नकारात्मक, स्कूलों से भाग जाने वाले छात्रों का प्रतिशत ७८.३, यहां की राजधानी कोलकाता की हालत पटना, रांची और भुवनेश्वर से भी दयनीय लेकिन हत्या, अपहरण और बलात्कार में देश के औसत से दो-गुना, तीन गुना बढ़ोत्तरी. यह नया बंगाल है जो ३० साल के जनवादी शासन के परिणामस्वरूप अपनी दशा को दुर्दशा में बदला देखकर भी कुछ नहीं कर पा रहा है.

पश्चिम बंगाल को केन्द्रबिन्दु बनाकर अर्थशास्त्री विवेक देबरॉय और लवीश भंडारी ने एक ह्वाईट पेपर जारी किया है. लवीश भंडारी और विवेक देबराय दोनों ही शोध संस्था इंडिकस एनेलिटिक्स से जुड़े हुए हैं. इंडिकस द्वारा जारी इस ह्वाईट पेपर में पश्चिम बंगाल की जो तस्वीर उभरकर सामने आती है वह यह कि पश्चिम बंगाल कंगाल हो चुका है. बिजली, पानी, सड़क, रोजगार, स्वास्थ्य हर मोर्च पर पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार नाकाम साबित हुई है. हालांकि ह्वाईट पेपर का सारा जोर प्रदेश के पूरी तेजी से औद्योगीकरण न होने पर केन्द्रित है और सुझावों में भी यही कहा गया है कि ऐसा माहौल बनाया जाना चाहिए कि प्रदेश में तेजी से औद्योगीकरण हो. लेकिन इस जांच-पड़ताल में जो दूसरे तथ्य उभरकर सामने आये हैं वह रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं.

पश्चिम बंगाल की १४.६ प्रतिशत शहरी आबादी गरीबी रेखा ने नीचे रह रही है जबकि गरीबी रेखा के नीचे ग्रामीण आबादी का प्रतिशत २८.६ है. गरीबी और बदहाली का परिणाम क्या आ रहा है यह वहां के हत्या बलात्कार और अपहरण के कारोबार को देखकर समझ में आ जाता है. पश्चिम बंगाल का उद्योग भले ही चौपट हो गया हो लेकिन यहां अपहरण उद्योग ने खूब तरक्की की है. पश्चिम बंगाल में अपहरण उद्योग की विकास दर १.८ प्रतिशत है जो कि राष्ट्रीय औसत से तीन गुना अधिक है. वहीं देश में कुल अपराधों में बलात्कार का प्रतिशत १.१ है तो पश्चिम बंगाल में यह प्रतिशत ४.७ है. यानी राष्ट्रीय औसत से चारगुना ज्यादा.

इंडिकस एनालिटिक्स के बिबेक देबोराय और लवीस भंडारी के इस ह्वाईट पेपर में कहा गया है कि पश्चिम बंगाल सरकार पांच महारोगों से ग्रस्त है. ये पांच महारोग हैं-

१. विकास की रफ्तार बहुत धीमी है.

२. बेतहाशा बढ़ती जनसंख्या

३. पश्चिम बंगाल में गरीबी का एकछत्र साम्राज्य है

४. कामगारों के लिए काम नहीं, उद्योग धंधे पूरी तरह से चौपट हो गये हैं

५. पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार वित्तीय, सामाजिक और आधारभूत ढांचा विकसित करने में असफल रही है.

ये पांच कारण उद्योगों और भूमि छीनने के पारंपरिक कारणों से हटकर है। 1960 के बाद से अब तक राज्य के आंकडो का विश्लेषण करने के बाद इस रिपोर्ट ने स्वास्थ्य से लेकर शिक्षा और उद्योग, सेवा क्षेत्र से लेकर कानून व्यवस्था तक की स्थिति प्रदेश की स्थिति चिंता जनक है। वर्ष 2007-08 में पश्चिम बंगाल मे प्रति व्यक्ति राज्य जीडीपी 29457 रूपए था। इस तरह देश में इसका 18 वां स्थान था। रिपोर्ट ने साल दर साल पश्चिम बंगाल में कम्युनिष्ट सरकारों की योग्यता पर ही सवालिया निशान लगा दिया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह प्रदेश व्यापार के अनुकूल माहौल तैयार करने मे अक्षम रहा। रिपोर्ट में राज्य में कम विकास, रोजगार के कम अवसरों की बात की गई है। ये स्थिति उद्योग से लेकर सेवा क्षेत्र तक में है। कभी हिन्दुस्तान की राजधानी रहा कोलकता कारोबार करने में सहजता के मामले में बारहवे स्थान पर है। इससे बेहतर स्थिति पटना रांची जयपुर भुवनेश्वर और लखनऊ की है।

रिपोर्ट के मुताबिक पश्चिम बंगाल की सरकार कानून व्यस्था सुनिश्चित करने में भी अक्षम रहा है। रिपोर्ट के अनुसार यहां पुलिसकर्मियों की संख्या आबादी में प्रति 1लाख पर 94 है। जबकि राष्ट्रीय औसत 126 का है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पश्चिम बंगाल में अदालतों में न्यायिक मामले सुनवाई की आस में साल दर साल इकठ्ठे होते जा रहे है। गंभीर किस्म के अपराधों का प्रतिशत भी लगातार ऊंचा उठ रहा है। ये प्रदेश आधारभूत ढांचागत तंत्र उपलब्ध कराने में अक्षम रहा है। रिपोर्ट कहती है कि 2005-2006 में पश्चिम बंगाल में 27.9 फीसदी घरों में ही साफ पानी पहुंचता था। जबकि महाराष्ट्र में 78.4 फीसदी घरों में साफ पानी पहुंचता है। तमिलनाडु में 84.2 फीसदी घरों में साफ पानी मिलता है। रिपोर्ट के मुताबिक शिक्षा के क्षेत्र में भी पश्चिम बंगाल धराशाई रहा है। कैग ने भी सर्व शिक्षा अभियान के क्रियान्वयन को लेकर राज्य की सुस्ती पर लताड लगाई है। भारत की बौध्दिक राजधानी के नाम से विख्यात राज्य में स्कूल ड्राप आउट रेट 1से10वीं तक 78.03 फीसदी है। सिर्फ बिहार, नागलैंड , मेघालय और सिक्किम ही अधिक पिछड़े है। रिपोर्ट के मुताबिक स्वास्थ्य के मोर्चे पर तो इस रिपोर्ट में कई कसौटियों पर पश्चिम बंगाल के प्रदर्शन को बांग्लादेश से भी अधिक खराब पाया गया है। वित्तीय प्रबंधन का भी बुरा हाल है. पश्चिम बंगाल में राजस्व घाटा 4.0 फीसदी रहा। जबकि औसतन भारतीये राज्यों में ये घाटा न होकर 0.4 फीसदी अतिरिक्त बढोत्तरी के रूप में है.

देश की बौद्धिक राजधानी अब अशिक्षा की शिकार

कभी देश की बौद्धिक राजधानी कहा जानेवाला बंगाल अब अशिक्षा का शिकार है. शिक्षा का सही विस्तार देखना हो तो देखा जाता है कि नौजवानों में शिक्षा का प्रसार किस प्रकार है. पश्चिम बंगाल में स्कूलों में दाखिले का प्रतिशत ९४.६७ प्रतिशत है जो कि उत्तराखण्ड, हिमाचल, अरूणाचल, मध्य प्रदेश, उड़ीसा और राजस्थान से भी कम है. लेकिन ऐसा नहीं है कि दाखिले के स्तर पर ही हालत दयनीय है. जितने बच्चे स्कूलों में दाखिला लेते हैं उनमें से कक्षा १ से १० तक पहुंचते-पहुंचते ७८.०३ प्रतिशत बच्चे स्कूल छोड़कर चले जाते हैं. प्रति बच्चे पर पश्चिम बंगाल शिक्षा पर १२७९ रूपये का निवेश करता है जबकि बगल का राज्य आसाम भी कक्षा १ से १० के छात्रों के लिए प्रति छात्र ३४२१ रूपये खर्च करता है. पश्चिम बंगाल में प्रति अध्यापक ५७ छात्र हैं जबकि तमिलनाडु में प्रति शिक्षक ३४ छात्र हैं. इसी तरह उच्च शिक्षा के क्षेत्र में प्रति १०० छात्रों पर ३ अध्यापक हैं जबकि बगल के राज्य आसाम में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में प्रति १०० छात्र पर ७ अध्यापक हैं.

(www.visfot.com से साभार)

कोई भी मूल्य एवं संस्कृति तब तक जीवित नहीं रह सकती जब तक वह आचरण में नहीं है.


अमीर धरती गरीब लोग

छत्तीसगढ़वासियों को `अमीर धरती के गरीब लोग´ कहा जाता है। कुदरत ने इस प्रदेश को अकूत संपदा का वरदान दिया है। इस नैसर्गिक संपदा के बावजूद छत्तीसगढ़ की 45 फीसदी आबादी के गरीबी रेखा के नीचे होने के क्‍या कारण हो सकते हैं और इन विधानसभा चुनावों से यहां के लोगों की क्‍या हैं आशाएं...
एक नवंबर 2000 को मध्यप्रदेश के कुछ हिस्से को काटकर छत्तीसगढ़ का गठन किया गया था। छत्तीसगढ़ के निर्माण की मांग पिछड़ेपन, गरीबी, अशिक्षा और लगातार उपेक्षित बने रहने के कारण लम्बे समय से की जा रही थी। इस राज्य में 75 फीसदी आबादी सीमांत एवं छोटे किसानों की है जबकि सींचित भूमि सिर्फ 29 प्रतिशत है। यहां 32 फीसदी आबादी अनुसूचित जनजातियों, जबकि 12 फीसदी अनुसूचित जाति के लोग रहते हैं और 45 फीसदी परिवार गरीबी रेखा के नीचे गुजर बसर करते हैं। राज्य का 44 प्रतिशत हिस्सा वनों से घिरा हुआ है। जनजातीय आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा लघु वनोपज संग्रह पर आश्रित रहता है। धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ के किसानों के लिए सिंचाई सुविधाओं का न होना एक बड़ी समस्‍या रही है। जबकि धान एक ऐसी फसल है जो पानी की अधिक मांग करती है। ये आंकड़े छत्तीसगढ़ की एक छोटी सी तस्वीर प्रस्तुत करते हैं, जिससे स्‍थानीय जनमानस की अपेक्षाएं वहां की परिस्थितयों के मुताबिक क्‍या हो सकती हैं, इस बात का अंदाज लगाया जा सकता है। 70 के दशक में छत्तीसगढ़ के वन क्षेत्रों में पनपने वाला नक्सलवाद आज यहां कैंसर का रूप ले चुका है। आलम यह है कि करीब 40 हजार आदिवासियों को सेना के संरक्षण में अपना घर-बार छोड़कर शिविरों में रहना पड़ रहा है। जानकारों की मानें तो नक्सलवाद पर आज सत्‍ता पक्ष एवं विपक्ष की स्थिति एक सी है। राज्य की आंतरिक सुरक्षा एवं विकास के लिए खतरा माने जाने वाले नक्सली आतंक को लेकर कोई कार्ययोजना जनप्रतिनिधियों के पास नहीं है.

बहरहाल सरकारी दावे तो काफी हैं। जल, जंगल, जमीन, जुवान (छत्तीसगढ़ी) और जीविका के संबंध में सुधार किये जाने की बात सरकार करती है। कृषि को लाभकारी बनाने के साथ किसानों को फसल का सही मूल्य दिलाने की बात भी कही जा रही है। सरकार कहती है कि गरीबों की बुनियादी सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए 3 रुपये की दर से 35 किलो चावल और 25 पैसे प्रति किलो नमक दिया जा रहा है। गरीब परिवारों को बिना राशन कार्ड के मिट्टी तेल, 9 लाख से अधिक गरीब परिवारों को एकल बत्ती कनेक्शन एवं 49 लाख राशनकार्ड धारकों को रियायती दरों पर खाने का तेल दिए जाने का दावा भी सरकार करती है। वनवासियों को पट्टा, नये स्कूल, आश्रमशाला, बालिकाओं को साईकिलें, मध्यान्ह भोजन आदि से वनवासी बालक/बालिकाओं की साक्षरता में व्यापक सुधार के दावे भी इसी फेहरिस्त में शामिल हैं।

लेकिन जमीनी हकीकत क्या है? इस बात को जानने के लिए हमने बिलासपुर शहर के मुहाने पर बसे गांव उस्लापुर का दौरा किया। मुख्य सड़क से उस्लापुर को जाने वाली सड़क कई वर्षों से कच्ची पड़ी है। गांव वालों ने बताया कि यहां लौह अयस्क के अपशिष्ट को फेंका जाता है। इस कूड़े को लाने वाले ट्रकों का आना जाना यहां हमेशा बना रहता है। जिससे उड़ने वाली धूल मिट्टी ने टीबी एवं दमे जैसी बीमारियां स्थानीय लोगों को सौगात दी हैं। इसी तरह की स्थिति छत्तीसगढ़ के अन्य नगरों जैसे रायपुर, भिलाई इत्यादि की भी है। उस्लापुर में रहने वाले अधिकतर लोग सतनामी एवं गोंड जाति के भूमिहीन मजदूर हैं। 55 वर्षीय चैतराम टंडन भी उन्हीं में से एक हैं। वे बताते हैं कि `सरकार 3 रुपये किलो चावल तो दे रही है, लेकिन सिर्फ 35 किलो से पूरे परिवार का पेट नहीं भरता। ऐसे में बाकी चावल 16 रुपये की दर से खरीदना पड़ता है।´ हमने उनसे पूछा कि सरकार आखिर कितना वहन कर सकती है? जवाब देते हुए सुरेश कुमार कहते हैं कि हम फ्री में नहीं मांग रहे हैं, लेकिन सरकार कम से कम इस बात की व्यवस्था कर दे कि सही दाम पर समान मिल जाये। महंगाई की बात करते हुए वे कहते हैं कि टमाटर यहां 40 रुपये किलो है। कुछ अन्य लोगों ने बताया कि खाने के तेल कि घोषणा राज्‍य सरकार ने उचित मूल्य पर उपलब्ध कराने की थी। लेकिन सिर्फ एक बार ही तेल मिल पाया है.

औद्योगीकरण से आम छत्तीसगढ़िया को कुछ मिला तो वह प्रदूषण और उससे फैलने वाली बीमारियां हैं। अक्सर आरोप लगते हैं कि राज्य के विकास में आम छत्तीसगढ़िया की भागीदारी नहीं मिल पा रही है। स्थानीय लोगों के शिक्षा एवं कौशल में पिछड़ेपन पर इस बात का ठीकरा मढ. दिया जाता है।उस्‍लापुर के ही शंख कुमार टंडन कहते हैं कि इस बार बरसात अच्छी नहीं होने से फसल कमजोर है। ऐसे में धान कटाई में मजदूरी मिलना आसान नहीं रहेगा। हालांकि पीने के पानी के लिए गांव में 20 नलकूप होने की बात ग्रामीणों ने स्वीकार की। लेकिन सेनीटेशन की समस्या को अधिकतर लोगों ने गिनाया। उन्होंने यह भी बताया कि बिजली तो आमतौर पर रहती है, लेकिन ट्रांसफार्मर कम क्षमता का होने से पूरा लोड नहीं मिल पाता। 25 पैसे किलो नमक मिलने की बात को भी लोगों ने स्वीकार किया। बालिकाओं को साईकिल मिल रही है क्या? इस सवाल का जवाब मिला कि `उस्लापुर में तो किसी लड़की को साईकिल नहीं मिली है। लेकिन पास के गांव में कुछ लड़कियों को जरूर साईकिलें मिली हैं। कुछ लोग इस बात को स्‍वीकारते हैं कि आदिवासियों के जीवन की जड़ता को समाप्‍त करने में ये कदम कारगर साबित होंगे। 3 रुपये किलो चावल 34 लाख परिवारों को दिये जाने के सरकारी दावे हालांकि पचते नहीं हैं, क्‍योंकि आंकड़ तैयार करने में अधिकारी न जाने कैसे गच्‍चा खा गए। इस बात को लेकर सरकार पर उंगलियां जरूर उठी हैं। राजनीतिक विश्‍लेषक रमेश नैयर अमर्त्‍य सेन की थ्‍योरी का हवाला देते हुए कहते हैं कि `अनाज की कमी कभी नहीं होती है, बल्कि लोगों में परचेजिंग पावर नहीं होती।´ वे कहते हैं कि 'बहुत सारे हिस्सों में सूखा पड़ा है। फिर किसानों को यह थोड़ी कहा जा रहा है कि तुम 3 रुपये किलो में ही चावल बेचो। ऐसे में कांग्रेस और सीपीआई का यह प्रचार की किसान कम दामों में चावल देने पर निकम्मे हो जाएंगे सही नहीं है। सरकार एक-एक दाना धान का खरीद रही है। हां फ्री में बांटने से एक नुकसान हुआ है। लेबर मिलना कठिन हो गया है और शराब की बिक्री बढ़ी है.'

भ्रष्टाचार के आरोपों से वर्तमान सरकार का दामन दागदार हुआ है।

विपक्ष ने तो सरकार के खिलाफ 101 आरोपों की पुस्तिका भी तैयार कर डाली है। बेलगाम नौकरशाही और भ्रष्ट मंत्रियों की नकेल न कसे जाने को लेकर भी मुख्यमंत्री को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है। लेकिन सीधे मुख्यमंत्री पर किसी तरह का आरोप विपक्ष के पास मौजूद नहीं है। इस बीच कुछेक जनसंगठनों ने छत्तीसगढ़ की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर `जनता का घोषणा पत्र´ तैयार किया है। इसमें सभी राजनैतिक दलों से आगामी पांच सालों के लिए विकास का मास्टर प्लान प्रस्तुत करने, कृषि को उद्योग का दर्जा दिए जाने, कृषि के लिए 33 फीसदी बजट राशि का प्रावधान करने, फसल बीमा प्रीमीयम सरकार द्वारा दिए जाने, आलू उत्पादन क्षेत्र-जशपुर, सरगुजा में आलू उत्पादों से बने उत्पादों के लघु उद्योग हेतु अनुदान एवं प्रोत्साहन दिए जाने, दुर्ग एवं राजनांदगांव में टमाटर की खेती को विकसित कर संबंधित लघु उद्योगों को विकसित करने, बस्तर में इमली, आंवला एवं जड़ी बूटियों पर आधारित उद्योग स्थापित करने और चावल से बनने वाले उत्पादों के लिए भी लघु उद्योग स्थापित करने की योजनाएं तैयार करने की बात कही गई है। इसमें 2 से 5 एकड़ के सीमांत किसानों की सहकारी समिति का निर्माण कर सामूहिक खेती हेतु ट्रेक्टर एवं अन्य कृषि उपकरण पर 50 फीसदी अनुदान दिए जाने की मांग भी जनसंगठनों ने की है। सिंचाई इस प्रदेश की खेती के लिए एक बड़ी समस्या रही है। इसके लिए एक पूरी पंचवर्षीय योजना समर्पित किए जाने की मांग की जा रही है। साथ ही प्रदूषण से निपटने के लिए प्रभावी कार्ययोजना की भी जरूरत है। छत्तीसगढ़ खनिज संपदा से युक्त है। यहां लौह अयस्क के अलावा, चूना पत्थर, टिन, यूरेनियम के भंडार हैं। साथ वनोत्पाद भी भारी मात्रा में है। जिसका अभी तक लाभ स्थानीय लोगों को नहीं मिल पाया है। उद्योग व्यापार के लिए एकल खिड़की प्रणाली बनाए जाने और नियमों के सरलीकरण की जरूरत महसूस की जा रही है। खनिज आधारित उद्योगों को अनुसूचित क्षेत्रों में स्थातिप करने के लिए विशेष पैकेज की बात भी जनता के घोषणा पत्र में कही गई है। पिछड़ेपन को दूर करने के लिए रेल यातायात के विस्तार की बात लम्बे समय से यहां उठती रही है। ऐसा माना जा रहा है कि बस्तर से सरगुजा, डोंगरगढ़ और जांजगीर चांपा तक रेल लाईन का विस्तार प्रदेश चौमुखी विकास में मील का पत्थर साबित होगा.

सस्‍ते दामों पर चावल दिये जाने की बात पर जनसत्‍ता (रायपुर) के स्‍थानीय संपादक अनिल विभाकर कहते हैं कि 'रातों-रात आदिवासी उपभोक्ता बन जाएं यह संभव नहीं है। योजनाएं तो यहां काफी है, लेकिन उनमें घपले भी हैं। यह सही है कि सरकार चावल योजना को चुनाव में भुना रही है। लेकिन कांग्रेस द्वारा 2 रुपये में चावल दिए जाने की बात विरोध जताने का कोई तरीका नहीं है। आगे वे कहते हैं कि कौशल आधारित प्रशिक्षण संस्थानों की तो घोषणा भर हुई है। लोगों के पिछड़ेपन का का एक बड़ा कारण शराब भी है। शराब माफिया हर जगह हैं। नक्सलवाद की बात यदि करें तो गृह मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक यहां नक्सली हिंसा में कमी आई है। यदि सरकार गंभीर नहीं होती तो यह संभव नहीं होता। शराबबंदी यदि हो जाए तो यह प्रदेश अपने आप पिछड़ेपन एवं गरीबी से उबर जाएगा। ' 'लोकमानस' के संपादक बबन प्रसाद मिश्र कहते हैं कि 'ब‍स्‍तरिया को शिक्षित नहीं होने दिया गया। यही काम आज नक्सली वहां कर रहे हैं और पूंजीपतियों के दलाल बने बैठे हैं। छत्तीसगढ़ जिसे पिछड़ेपन के आधार पर बनाया गया थाऋ भ्रष्टाचार, कुंबापरस्ती और चंद कारणों से यहां धन कमाने की अराजक स्थिति पैदा हुई है। छत्तीसगढ़ जमीन खरीदे जाने के मामले में ब्राजील को भी पीछे छोड़ चुका है। यह पैसा कहां से और कैसे आया? इसका सीधा सा उत्‍तर है भ्रष्‍टाचार। ' राज्य बनने के बाद विषमता एवं गरीबी कम जरूर हुई है, ले‍किन छत्तीसगढ़ीया को मनोरंजन एवं अजायबघर की चीज़ समझकर उसे नचाते रहने वाले लोगों की सोच का बदलना सबसे पहले जरूरी है.
(उमाशंकर मिश्र)
कोई भी मूल्य एवं संस्कृति तब तक जीवित नहीं रह सकती जब तक वह आचरण में नहीं है.