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20120502

पीले सोने का काला सच

हमारे देश में चमत्कार होना आम बात है लेकिन चमत्कार कि हकीक़त से भी सभी लोग वाक़िफ़ हैं। पीले सोने में गजब की आकर्षण क्षमता होती है,लेकिन चमत्कार की क्षमता नहीं। फिर यह चमत्कार कैसे हो रहा है की सोना दिन दुगनी और रात चौगुनी की तेज रफ्तार से बढ रहा है वह भी तब जब की मंदी का दौर है। यह सब खेल है पीले सोने के सहारे ब्लैक को व्हाइट करने का।

बात थोड़ी अजीब है लेकिन सोलह आने सच है। इस बात को समझने के लिए सोने के विषय में कानूनी स्थिति पर जरा नजर डालिए। भारत में शादीशुदा महीला 500ग्राम तक सोने रख सकती है और भारत सरकार का आयकर विभाग इतना सोने के विषय में पुछ ताछ नहीं करता क्योंकि ऐसा माना जाता है की भारतीय महिला चाहे वह कितनी भी गरीब क्यों न हो उसके पास सोना रहता है। और अगर इससे ज्यादा रखते हैं तब भी आयकर विभाग के  पुछ ताछ से बचा जा सकता है यह कहकर की यह गिफ्ट में मिला है बस आपको चन्द रुपए खर्च करके गिफ्ट सर्टिफिकेट बनवाना होगा जो आसानी से बन जाता है। हिंदु अविभाजित परिवार के पास उपलब्ध सोने की ज्वैलरी के विषय में भी आयकर विभाग नहीं पूछता क्योंकि सोने की ज्वैलरी पैतृक संपति के रुप में स्त्रीधन माना जाता है।

भारत में पीले सोने की खपत
दुनियाँ में भारत 10वें स्थान पर पीले सोने के स्वामित्व के आधार पर है। भारत में सबसे ज्यादा सोने की खपत दक्षिण भारत में है जो देश के पूरे  खपत का 40 प्रतिश्त है। औसतन देशभर में लगभग 500 से 750 टन सोने की खपत है। बिल क्रूड आयल के बाद देश में सबसे ज्यादा आयात सोने का ही होता है,ऐसोचैम के अनुसार 2015 में यह 100अरब के पार पहुँच जाएगा।

बेहद फायदे का कारोबार
सोने का कारोबार बेहद फायदे का कारोबार है इस कारोबार में रिस्क कम और फायदा बैंक एफ डी से भी ज्यादा होता है। सोने से किस प्रकार का चमत्कारी फायदा हो सकता है इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि महज 24 घंटे में में 10 ग्राम सोना आपको 1310 रुपए का फायदा दे सकता है जी हां यह कोई दास्तां नही बल्कि हकीक़त है। 18 अगस्त 2011 को 10 ग्राम सोने की कीमत 26,840 रुपए थी और 24 घंटे बाद 19 अगस्त 2011 को 10 ग्राम सोने की कीमत हो गई 28,150 रुपए यानी 24 घंटे में 1310 रुपए का बचत। यह है पीले सोने का करिश्मा।

कैसे होता है काले धन को सफेद करने का खेल
गोल्ड लोन के जरिए- काले धन से पहले लोग कैश से सोने की ज्वैलरी की खरीदारी करते है क्योंकि कैश से सोना खरीदने में कोई टेक्स नहीं लगता और सोना बेचने वाले के लिए यह भी जरुरी नहीं के पैसा कैसा है। बाद में सरकारी व अर्धसरकारी बैंक से गोल्ड के अगेन्सट लोन ले लेते है। हो गया न ब्लैक से व्हाइट मनी क्योंकि लोन का पैसा तो बैंक के जरिए मिला है। इस तरह से बड़े आसानी से हो जाता है ब्लैक से व्हाइट मनी वो भी बिना टैक्स के। यही कारण है की गोल्ड लोन का कारोबार बड़ी तेजी से बढ रहा है। गोल्ड लोन कि जिस तरह से मार्केटींग हो रही है काफी हद तक इस बात की पुष्टि भी करता है कि यह खेल अब कितना व्यापक पैमाने पर हो रहा है।

सोने की खरीद और अर्थव्यवस्था
भारत में सोने की खरीदारी पर पाबंदी नहीं है लेकिन आर्थिक सर्वे में यह सुझाव दिया गया है कि यदि भारतीय सोने की खरीदारी कम करेंगें तो देश के अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा होगा। पहला कारण भारत में लोग सोने की होल्डिंग की जानकारी सरकार को नहीं देते हैं जिससे खरीदारी तो होता है लेकिन सरकार को वेल्थ टेक्स नहीं मिलता क्योंकि 30 लाख रुपए से ज्यादा पर 1प्रतिश्त वैल्थ टेक्स बनता है और कालाबाजारी को बढावा मिलता है। दुसरा कारण यदि खरीदारी जारी रही तो सरकार को आयात बढाना पड़ेगा और आयात बढा तो अर्थव्यवस्था कमजोर होगा।

पीले सोने की चमक यकीनन आकर्षक है और सोने से मिलने वाला लाभ चमत्कारी लेकिन कालाबाजारी और काले को सफेद करने का खेल देश के लिए और देशवासियों के लिए गुणकारी नहीं।
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------------------------------------------------------ कोई भी मूल्य एवं संस्कृति तब तक जीवित नहीं रह सकती जब तक वह आचरण में नहीं है.

20100119

रिलायंस जनरल इंश्योरेन्स धोखाधड़ी में अव्वल

बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (इरडा) ने उन 10 बीमा कंपनियों पर जुर्माना लगाया है जिन्होंने साल 2008-09 के दौरान नियमों का उल्लंघन किया है। सबसे अधिक जुर्माना अनिल धीरूभाई अंबानी समूह की कंपनी रिलायंस जनरल पर लगाया है। इरडा की सालाना रिपोर्ट के अनुसार 'इरडा के नियमों एवं दिशानिर्देशों के उल्लंघन' के लिए कंपनी पर 20 लाख रुपये का जुर्माना किया गया है।

सार्वजनिक क्षेत्र की दो बीमा कंपनियों-न्यू इंडिया और नैशनल इंश्योरेंस तथा निजी क्षेत्र की इफको टोकियो और एचडीएफसी अर्गो पर भी 5-5 लाख रुपये का जुर्माना नियमों का उल्लंधन करने के लिए लगाया गया है।

निजी क्षेत्र की साधारण बीमा कंपनी आईसीआईसीआई लोम्बार्ड प्रवासी भारतीय बीमा योजना के मामले में 'फाइल ऐंड यूज' दिशानिर्देशों का पालन नहीं करने पर 5 लाख रुपये का जुर्माना किया गया है। जिन कंपनियों पर जुर्माना लगाया गया उनमें से अधिकांश साधारण बीमा क्षेत्र की हैं। केवल एक जीवन बीमा कंपनी, मैक्स न्यूयॉर्क लाइफ पर यूलिप योजनाओं के दिशानिर्देशों का पालन नहीं करने, पर 5 लाख रुपये जुर्माना लगाया गया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के निजी जीवन बीमा उद्योग को 2008-09 में 4,879 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। यह इससे पिछले वर्ष के मुकाबले 43 फीसदी अधिक है। नुकसान की भरपाई करने के लिए निजी जीवन बीमा कंपनियों के प्रमोटरों ने 2008-09 में 5,956 करोड़ रुपए लगाए हैं। यह रकम पिछले 10 साल में प्रमोटरों द्वारा निवेश की गई राशि के बराबर है।

2008-09 के नुकसान को मिलाकर जीवन बीमा उद्योग का कुल घाटा 8,585 करोड़ रुपए पर पहुँच गया है। इरडा की सालाना रिपोर्ट में कहा गया है कि बीमा उद्योग को बहुत सी चुनौतियों का सामना करना पड़ा रहा है। इनमें मांग में कमी, ब्याज दरों का गिरना और बहुत सी कंपनियों की अतिरिक्त पूंजी की जरूरत प्रमुख हैं। इरडा ने कहा कि उसका अनुमान है कि नई निजी जीवन बीमा कंपनियों को कारोबार के पहले सात से 10 साल में नुकसान उठाना पड़ेगा। इरडा के अनुसार, 'जीवन बीमा उद्योग में पूंजी की अधिक जरूरत होती है और बीमा कंपनियों को प्रीमियम की आमदनी में वृद्धि के लिए समय-समय पर पूंजी लगानी पड़ती है।'

इरडा की रिपोर्ट के अनुसार 22 जीवन बीमा कंपनियों में से केवल चार ने 2008-09 में मुनाफा दिया है। इनमें भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी), कोटक महिंद्रा, मेट लाइफ और श्रीराम शामिल हैं। एलआईसी का मुनाफा बढ़कर 957.35 करोड़ रुपए पर पहुंच गया है। इससे पिछले वर्ष यह 844.63 करोड़ रुपए था। कोटक महिंद्रा ने पहली बार 14.34 करोड़ रुपए का शुद्ध मुनाफा दर्ज किया है। पिछले वर्ष कंपनी को 71.87 करोड़ रुपए का घाटा हुआ था। मेट लाइफ का शुद्ध मुनाफा 14.52 करोड़ रुपए और श्रीराम का 8.11 करोड़ रुपए रहा है।

(www.visfot.com)

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कोई भी मूल्य एवं संस्कृति तब तक जीवित नहीं रह सकती जब तक वह आचरण में नहीं है.

20090503

स्विस बैंक, सफ़ेदपोश नेता और, काला धन

अभी हाल ही में The New Indian Express में प्रकाशित गुरुमूर्ति जी का लेख (Who will probe first family's billions?) पढ़ा.

इस लेख में जो भी पढ़ने को मिला तो एक पल को विस्मित हो गया था..... पर अब जैसा कि रोज़-रोज़ ऐसे वाकिये सुनने की आदत हो गयी है सो अपने को सँभाल लिया.

सोचने की बात है कि (बातें तो और भी हैं पर कोई सोचता ही नहीं):

१- काले धन पर जब दुनिया के बहुत सारे देश मुहिम छेड़े हुए हैं तब भारत के माननीय प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी बिना एक शब्द बोले G-20 देशों की बैठक से वापिस आ गये. इसका उत्तर अति-शिक्षित मनमोहन सिंह जी के पास नहीं है.

२- एक सौ करोड़ से अधिक की जनसंख्या वाले देश का प्रधानमंत्री Nuclear Deal पर हस्ताक्षर करने के छः माह बाद ये खुलासा करे कि यदि ये deal नहीं होती तो वह त्यागपत्र दे देता. ये कथन क्या प्रकट कर रहा है?

और मुद्दों पर न जाते हुए केवल इन्हीं दो उदाहरणों से एक बात साफ़ हो जाती है कि सत्ता की कुंजी उनके हाथ में नहीं है. और वह एक सहायक की भाँति वही बोलते और करते हैं जो उनको बोला जाता है... अर्थात कठपुतली प्रधानमंत्री. इसके विपरीत यदि वो सारे निर्णय स्व-विवेक से लेते हैं तो देश हित से जुड़े उन दो मुद्दों पर जो पूर्णरूप से स्पष्ट थे ऐसा राष्ट्रघाती निर्णय कैसे ले सकते हैं.

जैसा कि स्पष्ट है कि दोनों मुद्दे पैसे से जुड़े हैं पहला रिश्वत का काला धन एकत्र करने के संदर्भ में और दूसरा किसी भी deal में मिलने वाली रिश्वत के संदर्भ में. आप बतायें कि क्या ये घोटाले नहीं हैं? वो बात अलग है कि ये सब घोटाले वो पार्टीहित में कर रहे हैं. प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन जी एक नयी गाथा लिखी है. अपनी गलतियां और कमजोरियां छिपाने के लिये वो अपना RESUME पढ़ कर सुनाने लगते हैं.

अब फ़िर से गुरुमूर्ती जी के लेख पर आते हैं. पत्रिका के हवाले से उन्होंने तीन बातें सामने लाईं हैं:


1- $2.2 billions in Rajiv's secret accounts, says Swiss magazine, Schweizer Illustrierte (November 11, 1991).


2- Family benefited from KGB, says book.


3- Bofors slush payoff to ‘Q’.

आप जानते हैं कि ये तीन ख़तरे हैं कांग्रेस के लिये. कांग्रेस और इस देश के नये कर्णधार राहुल गाँधी कहते हैं कि सत्ता में आने के बाद वो इसकी जाँच कराएंगे. आपको लगता है कि जाँच होगी???
क्वात्रोकी को सोनिया अम्मा की दोस्ती से जो फ़ायदे हुए उस बोफ़ोर्स घोटाले की जाँच तो अभी भी चल रही है... ये जाँच तो शायद मेरे पोते भी देखेंगे.

अब आप बतायें कि एक पढ़ा लिखा आदमी केवल सत्ता के लालच में एक देशद्रोही परिवार की पार्टी का हित साधने में मगन है और हम हैं कि उन सबको बार-बार जिता कर संसद भेज देते हैं.

मेरा प्रश्न इस देश की जनता से है जो Internet का प्रयोग करती है, अपने को पढ़ा-लिखा और समझदार बोलती है: कब तक करते रहेंगे यह गलती, कब लेंगे सबक?
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20090430

काले धन पर बेरुखी

डा. मनमोहन सिंह और उनकी सरकार स्विस बैंकों में जमा हजारों करोड़ रुपये का धन वापस भारत लाने में रुचि क्यों नहीं ले रही है? क्या कारण है कि जब विश्व के अधिकाश देश स्विस बैंकों में जमा अपने-अपने देश का काला धन वापस पाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं तो भारत सरकार पिछले एक साल से इस विषय में या तो मौन है या बहानेबाजी पर उतारू है। यह स्थापित सत्य है कि पिछले 60 वषरें में भारत की अकूत संपत्ति भ्रष्ट नेताओं, अधिकारियों और करचोर व्यापारियों के द्वारा स्विस बैंकों में जमा की गई है। काग्रेस भाजपा पर विदेशों में जमा काले धन की राशि को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का आरोप लगा रही है। अमेरिका स्थित 'ग्लोबल फाइनेंसियल इंटेग्रिटी' के ताजा अनुमान के अनुसार भारत से प्रतिवर्ष 1,35,000 करोड़ रुपये स्विस बैंक आदि में जमा कराया जाता है। 160 विकासशील देशों की सूची में भारत का स्थान पाचवा है। जीएफआई के अनुसार 2002 से 2006 के बीच भारत से औसतन 1,13,500 करोड़ रुपये से 1,36,500 करोड़ रुपये (22.7 अरब से 27.3 अरब डालर) प्रतिवर्ष काला धन विदेशी बैंकों में जमा होता रहा। जीएफआई के अनुसार विकासशील देशों से इसी अवधि में प्रतिवर्ष एक खरब डालर काला धन विदेशों में जमा हुआ है। वास्तव में राशि का आकार महत्वपूर्ण नहीं है। काले धन की राशि यदि एक रुपया भी हो तो देश से चुराकर ले जाए गए धन की वापसी क्या नहीं होनी चाहिए?

'आर्गेनाइजेशन ऑफ इकोनोमिक कार्पोरेशन एंड डेवलपमेंट' (ओईसीडी) ने अप्रैल 2009 के शुरू में प्रकाशित लेखाजोखा में उल्लेख किया था कि स्विस बैंकों समेत टैक्स चोरी के अन्य स्वर्ग में 25 लाख करोड़ से लेकर 70 लाख करोड़ रुपये की धनराशि है। जर्मन के वित्त मंत्रालय ने एलटीजी बैंक से जो सूची प्राप्त की है उसमें करीब 100 भारतीयों के भी नाम शामिल हैं। काग्रेस यह प्रश्न कर रही है कि भाजपा ने अपने कार्यकाल में उक्त धन को वापस लाने का प्रयास क्यों नहीं किया? यह प्रश्न उतना ही बेतुका है, जैसे कोई यह पूछे कि पं. जवाहर लाल नेहरू ने मोबाइल फोन और कंप्यूटर लाने का प्रयास क्यों नहीं किया? आज से एक वर्ष पूर्व तक पश्चिमी देशों में 'बैंक सीक्रेसी' को व्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देखा जाता था, किंतु अमेरिका में 9/11 के आतंकवादी हमले और वैश्विक आर्थिक मंदी के चलते परिस्थितिया बदलीं और विकसित देशों में इस पर पुनर्विचार प्रारंभ हुआ। लालकृष्ण आडवाणी ने पिछले साल अप्रैल माह में ही डा. मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर समुचित कदम उठाने की अपील की थी। तत्कालीन वित्त मंत्री की ओर से जो जवाब आया उससे सरकार द्वारा कदम उठाने का संकेत मिला था, किंतु धन वापसी की प्रक्रिया प्रारंभ करने की जगह सरकार ने जर्मनी स्थित भारतीय राजदूत को पत्र लिखकर यह निर्देश दिया कि स्विस बैंकों में काला धन रखने वाले भारतीयों का नाम उजागर करने के लिए जर्मनी सरकार पर दबाव नहीं डाला जाए। क्यों?

वैश्विक मंदी के कारण जर्मनी, फ्रांस, अमेरिका, ब्रिटेन आदि आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। दुनिया भर के बैंक कंगाली के कगार पर हैं और यूरोपीय देशों के नेता इसमें स्विस बैंक जैसे टैक्स चोरी के स्वर्ग की गोपनीय कार्यप्रणाली का बड़ा योगदान मानते हैं। यूरोपीय देशों ने जी-20 के मंच से टैक्स चोरों के पनाहगाहों में जमा की गई राशि अपने देश वापस लाने का ऐलान किया। 2008 की तीसरी तिमाही में जर्मन सरकार ने कर चोरों को संरक्षण देने के कारण स्विट्जरलैंड को ब्लैक लिस्ट करने के लिए 'ओईसीडी' पर दबाव डाला। उधर अमेरिका ने विधिक मुकदमे के द्वारा स्विट्जरलैंड के सबसे बड़े बैंक-यूबीएस से करीब 300 अमेरिकी करचोरों के नाम जानने में सफलता प्राप्त की। फरवरी माह में बर्लिन में आयोजित जी-20 की बैठक में यूरोपीय देशों ने यह निर्णय लिया कि अप्रैल में लंदन में होने वाली बैठक में टैक्स चोरी के ठिकानों के खिलाफ वैश्विक मुहिम छेड़ी जाएगी। जी-20 की बैठक के लिए लंदन रवाना होने से पूर्व आडवाणी ने प्रधानमंत्री से कहा कि बैंकिंग गोपनीयता खत्म करने के लिए भारत को जी-20 द्वारा किए जा रहे प्रयासों में सक्रिय भूमिका अदा करनी चाहिए। प्रधानमंत्री ने सलाह अनसुनी कर दी। काग्रेस ने कहा कि जी-20 ऐसे मामलों को उठाने का उपयुक्त मंच नहीं है, जबकि सत्य यह है कि जी-20 की लंदन बैठक का मुख्य एजेंडा ही काला धन और टैक्स चोरी के ठिकाने थे। काग्रेस इस मामले में झूठ क्यों बोल रही है? फ्रांस के राष्ट्रपति सरकोजी ने तो बैंकों की गोपनीयता और टैक्स चोरी के ठिकाने खत्म करने के लिए यदि कुछ नहीं किया गया तो जी-20 के बहिष्कार की धमकी दे रखी थी।

काग्रेस नीत सरकार काले धन की वापसी के प्रश्न पर इतनी घबराई हुई क्यों है? उसकी विवशता क्या है? इन प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए हमें बोफोर्स दलाली काड को याद करना होगा। अस्सी के दशक में रिलायंस घोटाले के सिलसिले में एक अंग्रेजी दैनिक की ओर से एस. गुरुमूर्ति को जानकारी जुटाने का भार सौंपा गया था। इस विषय में हाल में गुरुमूर्ति ने अपने एक लेख में लिखा है, ''मैंने देश से बाहर जमा कराए गए काले धन का पता लगाने के लिए अमेरिकी जासूसी फर्म-फेयरफैक्स से संपर्क किया। मैंने भारत सरकार से फेयरफैक्स को जाच कार्य सौंपने का निवेदन किया। स्विस सूत्रों के अनुसार तब काले धन के रूप में करीब 300 अरब डालर स्विस बैंकों में जमा थे, किंतु 13 मार्च, 1987 को मुझे सीबीआई ने फर्जी आरोपों में गिरफ्तार कर लिया। बाद में आरोप बेबुनियाद साबित हुए। पूरे देश को पता लग गया कि सरकार ने मुझे निशाना क्यों बनाया? सरकार को अंदेशा था कि इस जाच से सत्ताधारी 'परिवार' की बोफोर्स दलाली और काली कमाई का भी खुलासा हो जाएगा। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाधी ने विनोद पाडेय, भूरे लाल जैसे ईमानदार प्रशासनिक अधिकारी को हटाने के साथ जाच की हामी भरने वाले तत्कालीन वित्तमंत्री वीपी सिंह को भी हटा दिया था।''

1984 की सहानुभूति लहर में विपक्ष का सूपड़ा साफ करने वाले राजीव गाधी को 1989 के चुनाव में शर्मनाक पराजय का मुंह देखना पड़ा, जिसमें भ्रष्टाचार ही बड़ा चुनावी मुद्दा था। काले धन के मामले से काग्रेस को बोफोर्स का भूत जिंदा होने का अंदेशा है। राजग के काल में क्वात्रोच्चि का खाता सील कराया गया था, जिसे संप्रग सरकार के काल में हटवा दिया गया। क्वात्रोच्चि बोफोर्स लूट का माल निकालने में सफल रहा। एक अनुमान के अनुसार स्विस बैंकों में जमा राशि हमारे कुल बजट का तीन गुना हिस्सा है। इस काले धन की वापसी से भारत की अर्थव्यवस्था का कायापलट हो सकता है। आज भारत पर 220 अरब डालर का विदेशी कर्ज है, हम उससे छुटकारा पा सकते हैं। आधारभूत संरचनाओं के विकास के लिए हमें वित्तीय कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ेगा. काले धन की वापसी की राह में रोड़े अटका कर काग्रेस वस्तुत: अपने दामन पर लगे बोफोर्स जैसे दागों को स्वयंसत्यापित कर रही है.
(बलबीर पुंज)
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