20090528

जाग स्वयं में लीन कुलीन

ये समझने का वक्त आ गया है कि हर समाज के केंद्र में इसकी राजनीति होती है. अगर राजनीति घटिया दर्जे की होगी तो सामाजिक हालात के बढ़िया होने की उम्मीद करना बेमानी है.

रोहिंटन मालू को जिस वक्त गोली लगी उस वक्त वे वही कर रहे थे जो उन्हें जिंदगी में सबसे ज्यादा प्रिय था - बढ़िया खाने का लुत्फ उठाना और नये-नये विचार सुझाना. रोहिंटन, ओबेरॉय-ट्राइडेंट के कंधार रेस्टोरेंट में मौजूद उन 17 लोगों में से थे जिन्हें बंदूक की नोक पर सीढ़ियों पर इकट्ठा होने को कहा गया था. ऊपरी तौर पर तो आतंकवादी ये दिखा रहे थे कि वे इन लोगों को बंधक बनाने जा रहे हैं मगर उनका असल इरादा सौदेबाजी का था ही नहीं. उनके एक हाथ में एके-47 थी और दूसरे में मोबाइल फोन. आधुनिकता और मध्यकालीन कट्टरता के इस विरोधाभास का प्रदर्शन करते उन हत्यारों ने अपने आकाओं से पूछा, ‘उड़ा दें?’ सिर्फ मौत के आंकड़ों से सरोकार रखने वाले उनके आका उधर से बोले, ‘उड़ा दो.’


रोहिंटन को सात गोलियां लगीं. और जब उनकी लाश बरामद हुई तो उसकी हालत ऐसी थी कि उन्हें सिर्फ उनकी उंगली में मौजूद अंगूठी से ही पहचाना जा सकता था. 48 साल का ये शख्स अपने पीछे छोड़ गया दो किशोरवय बो और अनगिनत अधूरे सपने. इनमें से कुछ सपने तहलका के लिए भी थे जहां रोहिंटन पिछले दो सालों से बतौर स्ट्रैटेजिक एडवाइजर काम कर रहे थे. वे एक करिश्माई व्यक्तित्व थे और मीडिया मार्केटिंग में उनका करिअर सफलता की कहानियों से मिलकर बना था.

रोहिंटन की मृत्यु में एक गहरी विडंबना भी छिपी है. उनकी मौत की वजह वही रही जिसकी अहमियत उनकी नजर में ज्यादा नहीं थी. हमारे साथ हर बैठक में वे राजनीति को लेकर तहलका के जुनून पर बेहद अचंभे और असमंजस में पड़ जाते थे. उनका मानना था कि उनके या कहें कि हमारे वर्ग के किसी भी व्यक्ति की मुश्किल से ही राजनीति में दिलचस्पी होगी, भला इस काजल की कोठरी का हमारी जिंदगी से क्या वास्ता और अगर होगा भी तो इतना नहीं कि हम इस पर इतना ध्यान दें. हमारे कई सीधे और आड़े-तिरछे तर्कों के बाद रोहिंटन अनमने तरीके से ये तो मान लेते थे कि हम कुछ हद तक सही हो सकते हैं मगर ये मानने को जरा भी तैयार नहीं होते कि ऐसा करना हमारे लिए व्यावसायिक रूप से फायदे का सौदा होगा. उनका तर्क होता था कि हमारे वर्ग के पाठकों की दिलचस्पी उन विषयों में होती है जो उनकी जिंदगी से जुड़ी हुई हैं मसलन, खानपान, फिल्में, क्रिकेट, फैशन, टीवी, स्वास्थ्य वगैरह वगैरह. राजनीति से संबंधित लेख तो उन पाठकों को मजबूरन झेलने पड़ते हैं.

विडंबना देखिए कि आखिर में रोहिंटन और उन जसे सैकड़ों बेगुनाहों की मौत की वजह राजनीति ही रही. वही राजनीति जो इस देश में हर दिन गरीबी, भुखमरी और उपेक्षा से हो रही लाखों मौतों की जड़ में है. अगर मुंबई में मरने वालों में से ज्यादातर उससे ताल्लुक रखने वाले नहीं होते तो देश की ज्यादातर दौलत और सुविधाओं तक पहुंच रखने वाले अभिजात्य वर्ग को इसकी फिक्र तक न होती. मगर मुंबई की घटना पर आज अगर सबसे ज्यादा शोर देश का यही कुलीन वर्ग मचा रहा है तो वजह सिर्फ यही है कि आतंक का ये जानवर आज अचानक अपनी सभी हदें पार कर उन संगमरमरी चारदीवारियों के भीतर घुस आया है जिनमें आज तक ये वर्ग खुद को सुरक्षित महसूस किया करता था. द ताज और द ओबेरॉय जसी जगहों पर इसी कुलीन वर्ग के लोग ठहरते हैं और खाना खाते हैं. वे पूछ रहे हैं. क्या इस देश में अब कोई जगह महफूज नहीं रही?

जिस कड़वी हकीकत से भारत का कुलीन वर्ग पांचसितारा होटलों में नजर आ रहे मलबे के टुकड़ों को देखकर दो-चार हो रहा है उसी कडवे सच को करोड़ों आम भारतीय रोज ङोलने को मजबूर हैं. भुखमरी से मर रहे बच्चे, आत्महत्या कर रहे किसान, शोषण का शिकार हो रहे दलित, सैकड़ों साल पुराने बसेरों से खदेड़े जा रहे आदिवासी, कारखानों के लिए जमीनों से बेदखल हो रहे किसान, अलग-थलग पड़ रहे अल्पसंख्यक..वे जानते हैं कि कुछ ऐसा है जो बहुत गलत हो रहा है. वे जानते हैं कि व्यवस्था काम नहीं करती, ये क्रूर हो गई है, इसमें इंसाफ नहीं मिलता और ये बस उन्हीं के लिए है जो इसे चला रहे हैं. कुलीन वर्ग से ताल्लुक रखने वाले हम लोगों को समझना होगा कि हममें से ज्यादातर इस व्यवस्था से मिले हुए हैं. ज्यादा संभावना यही है कि हमारे पास जितनी ज्यादा सुविधाएं और पैसा है इस अन्यायी व्यवस्था को पनपाने में हमारी भूमिका उतनी ही बड़ी हो.

हम सबके ये समझने का वक्त आ गया है कि हर समाज के केंद्र में इसकी राजनीति होती है. अगर राजनीति घटिया दर्जे की होगी तो सामाजिक हालात के बढ़िया होने की उम्मीद करना बेमानी है. कई दशक से इस देश का अभिजात्य वर्ग देश की राजनीति से हाथ झड़ता रहा है. पीढ़ियां की पीढ़ियां इसे एक गंदी चीज मानते हुए बड़ी हुईं. लोकराजनीति के जरिए आधुनिक भारत के निर्माण का विचाररूपी बीज बोया जाना और उसका खिलना इस महाद्वीप में पिछले एक हजार साल में हुआ सबसे अनूठा और असाधारण प्रयोग था. मगर पिछले 40 सालों में इसकी महत्ता को मिटाने की कोई कसर हमने नहीं रख छोड़ी है. हमारे संदर्भ में ये दोष हमारे मां-बाप का और हमारे बच्चों के संदर्भ में ये दोष हमारा है कि हमने संगठित दूरदृष्टि, संगठित इच्छाशक्ति और संगठित कर्मों की उस विरासत को आगे नहीं बढ़ाया. एक शब्द में कहें तो उस राजनीति को आगे नहीं बढ़ाया जिसने अपने स्वर्णकाल में एक उदार और लोकतांत्रिक देश बनाने का करिश्मा कर दिखाया था. आज रसातल को पहुंची राजनीति से उसी देश के बिखर जाने का खतरा आसन्न है.

इस तरह से देखा जाए तो हम दो तरह से दोषी हैं. एक, उस सामूहिक प्रयास को विस्मृत करने के और दूसरा, जो हो रहा है उसको बिना विरोध किए स्वीकारने के. ऐसा हमारी स्वार्थी वृत्ति और उथली सोच के कारण हुआ है. शाइनिंग इंडिया में हम जैसे साधनसंपन्न लोगों की जिंदगी बेहतर होती जा रही है और हमें लग रहा है कि सब कुछ बढ़िया चल रहा है. हम इस आधे सच में जीकर खुश हैं और बाकी लोगों की मुश्किल जिंदगी को देखना ही नहीं चाहते. दूसरे समाजों के पतन का कारण बने कुलीन वर्ग की तरह हम भी अपनी ऊर्जा का ज्यादातर हिस्सा सोचने-विचारने की बजाय खूब कमाने और उसे उड़ाने पर खर्च कर रहे हैं. हम चटपटी गपबाजियों में वक्त बिता रहे हैं और उन चीजों की तरफ नहीं देख रहे जिनसे हम असहज महसूस करते हैं.

कई सालों से ये साफ दिखाई दे रहा है कि जिस समाज में हम रहते हैं वह भेदभाव, भ्रष्टाचार, कट्टरता, नाइंसाफी जसी बुराइयों के चलते खोखला होता जा रहा है. राजनीतिक नेतृत्व लगातार उन नीतियों पर चलता जा रहा है जो जाति, भाषा, धर्म, वर्ग, समुदाय और क्षेत्र जसी दरारों को चौड़ा कर समाज को बांटती जा रही हैं. दुनिया के सबसे जटिल समाज के अभिजात्य वर्ग के रूप में हम ये देखने में असफल रहे हैं कि हमारे जटिल तानेबाने के कई जोड़ अत्यधिक संवेदनशील हैं. यानी एक गलती हादसों की एक पूरी श्रंखला पैदा कर सकती है. कांग्रेस ने अकालियों की हवा निकालने के लिए जनरैल सिंह भिंडरावाले को पैदा किया, भिंडरावाले ने आतंकवाद को पैदा किया, इंदिरा गांधी ने आतंकवाद के खिलाफ मोर्चा खोला, आतंकवाद ने इंदिरा गांधी की जान ले ली और इंदिरा गांधी की मौत से हुई हिंसा हजारों बेगुनाह सिखों के नरसंहार की वजह बनी. इस एक दशक के दौरान अनगिनत बेगुनाह, उग्रवादी और सुरक्षाकर्मी मारे गए. इसी तरह मंडल की हवा निकालने के लिए भाजपा ने कमंडल का कार्ड खेला, उन्मादी कार सेवकों ने बाबरी मस्जिद गिरा दी, दंगे भड़के, बदला लेने के लिए मुंबई धमाके हुए, दस साल बाद गुजरात में कार सेवकों से भरी एक बोगी जली, अगले कुछ दिनों में राज्य में 2000 मुसलमानों का नरसंहार हुआ, छह साल बाद आज भी इसकी प्रतिक्रिया में हिंसा जारी है.

एक और उदाहरण है. 1940 के दशक की शुरुआत में आजादी की लड़ाई के बीच में अचानक कुलीन मुस्लिम वर्ग एक अलग इस्लामी देश की मांग करने लगा, महात्मा गांधी ने इसका विरोध किया, अंग्रेजों ने इसका समर्थन किया, बंटवारा हुआ, दंगों में दस लाख लोग मारे गए, दो देशों में चार लड़ाइयां हुईं, दोनों की ऊर्जा का बड़ा हिस्सा एक दूसरे के खिलाफ खर्च हुआ, परमाणु हथियारों का जखीरा बना, मुंबई पर हमला हुआ.

इन सभी श्रंखलाओं में एक बात समान है. इनकी शुरुआत कुलीन वर्ग द्वारा लिए गए फैसलों से हुई. अनिगिनत विविधताओं से गुंथकर बना भारत का ताना-बाना बेहद नाजुक और जटिल है. कुलीन वर्ग के लिए ये बहुत अहम है कि वह इस तानेबाने और उसमें अपनी भूमिका को समझे. पूंजी, प्रभाव और सुविधाएं उसके नियंत्रण में हैं. वह इस ताने-बाने की मरम्मत कर सकता है. उसके पास देने के लिए काफी कुछ है और उसे उदारता से देना ही होगा. आम जनता, जिसके पास कुछ भी नहीं है, का गुस्सा और क्षोभ इस तानेबाने को सिर्फ पूरी तरह से ढहा सकता है. और याद रखें कि ज्वालामुखी जब फटता है तो उसमें अमीर और गरीब सभी समान रूप से जल जाते हैं.

सवाल उठता है कि फिर हमें क्या करना चाहिए? नेताओं को गालियां देने को निश्चित रूप से राजनीतिक जागरूकता नहीं कहा जा सकता. और वातानुकूलित जिंदगी जीने वालों की पाकिस्तान पर बम गिराने और टैक्स न भरने की मांग को भी बेतुका ही कहा जाएगा. इस तरह के मूर्खतापूर्ण नाटक को दिखाने की बजाय मीडिया को इसकी उपेक्षा करनी चाहिए. दुनिया में दुश्मनी की पहले ही अति हो चुकी है. हमें इसे शांत करने की जरूरत है न कि भड़काने की. जहां तक पाकिस्तान का सवाल है तो वह तो खुद ही गिरी हुई राजनीति की वजह से बर्बाद है. इसे बमों की बरसात की नहीं बल्कि मदद के हाथ की जरूरत है. याद रखना होगा कि जब संवेदनहीन नौकरशाह गुस्से में अपने दांत पीसते हैं तो इसका शिकार मासूम बच्चों को होना पड़ता है.

पिछले कुछ दिन से हो रहे प्रदर्शन और नारेबाजी सामूहिक तौर पर अपना गुस्सा निकालने से ज्यादा कुछ नहीं. सच पूछिए तो नेता भी वही कर रहे हैं जो हम कर रहे हैं. यानी सिर्फ अपने लिए सोचना, ज्यादा से ज्यादा कमाई करना और देश की बेहतरी के रास्ते में खड़ी चुनौतियों से मुंह मोड़ लेना. बस नेता की पहुंच ज्यादा है तो वह ये काम ज्यादा बेहतर तरीके से कर रहा है.

सबसे पहले हमें सच को ईमानदारी से स्वीकारने की जरूरत है. इस बात को मानने की जरूरत है कि हमने राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया की गाड़ी पटरी से उतार दी है. पांच करोड़ भारतीयों की समृद्धि से देश विकसित नहीं हो जाएगा, खासकर तब जब 50 करोड़ लोगों के लिए जिंदा रहना ही एक संघर्ष हो. आजादी के 60 साल बाद भी आसानी से कहा जा सकता है कि भारत के राजनीतिक नेतृत्व और कुलीन वर्ग ने देश के वंचितों को बुरी तरह निराश किया है. अगर आप देखने की जहमत उठाएं तो आज का भारत वो जगह है जहां नवजात बो मक्खियों की तरह मरते हैं और जहां समान अवसरों की बात एक क्रूर मृगतृष्णा से ज्यादा कुछ नहीं.

एक बात हमें साफ तौर पर जान लेनी चाहिए. हम पर संकट इसलिए नहीं है क्योंकि ताज में मौत का तांडव हुआ बल्कि इसलिए है कि गुजरात में 2000 मुसलमानों की हत्या के छह साल बाद भी इंसाफ का दूर-दूर तक नामोनिशान नहीं है. गैरबराबरी के बाद ये दूसरी बात है जिसे कुलीन वर्ग को समझना होगा. सभ्यता की शुरुआत से ही हर समाज की बुनियाद इंसाफ का पहिया रहा है. आप सिर्फ उन लोगों के लिए ही मोमबत्तियां कैसे जला सकते हैं जो आपके वर्ग से हों. आपको हर नागरिक के लिए आवाज उठानी होगी.

हमें नए कानूनों की जरूरत नहीं है. जरूरत है तो ऐसे लोगों की जो पहले से ही मौजूद कानूनों पर अमल सुनिश्चित कर सकें. आज हमारी सारी संस्थाएं और प्रक्रियाएं जर्जर हो रही हैं. हमने उन मूल्यों और दूरदृष्टि के साथ ही समझौता कर लिया है जिन्हें ध्यान में रखकर इन संस्थाओं की नींव रखी गई थी. अब हर संकट की घड़ी में क्षत बचाने के लिए हम साहस के चंदेक व्यक्तिगत उदाहरणों पर ज्यादा निर्भर रहते हैं. हमें ये याद रखना होगा कि महान व्यवस्थाएं और समाज ऐसे प्रेरणादायीकार्यों की एक समूची श्रंखला से बनते हैं जिनकी सोच निजी स्वार्थ के परे हो. अपने ऊपर से प्रेरणा पाकर लोग अपना सर्वोत्तम करने का प्रयास करते हैं. चारों तरफ नजर दौड़ाइए. कितने कांस्टेबल, हेड कांस्टेबल, सब इंस्पेक्टर ऐसे होंगे जो उन भ्रष्ट लोगों के लिए अपनी जान दांव पर लगाएंगे जिनकी सेवा में वे तैनात रहते हैं.

काश मुंबई में पिछले हफ्ते बरसे आतंक में रोहिंटन की जान बच जाती. एक पल में वे हमारा पक्ष समझ गए होते. आर्थिक और सामाजिक सुधारों से कहीं ज्यादा जरूरत आज राजनीति में आमूल-चूल बदलाव की है, उस शुचिता की, जिसने देश को आजादी दिलाई. भारत के कुलीन वर्ग को अपने हाथों के गंदे होने का डर छोड़ना होगा. तभी उसे एक साफ-सुथरा देश मिल सकेगा.
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कोई भी मूल्य एवं संस्कृति तब तक जीवित नहीं रह सकती जब तक वह आचरण में नहीं है.

छाया वीर

इतिहास आखिरकार मनमोहन सिंह का फैसला इस आधार पर नहीं करेगा कि वे क्या थे और उन्होंने क्या किया बल्कि ये फैसला इस आधार पर होगा कि उनके जाने के बाद क्या हालात उभरे?

पांच साल का कार्यकाल सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का विश्लेषण दूसरे किस तरह कर रहे हैं इससे ज्यादा दिलचस्प ये जानना होगा कि खुद मनमोहन अपना आकलन कैसे करेंगे. मन के दर्पण में झांकने पर उन्हें किस तरह का अक्स नजर आएगा? क्या ये अक्स ऐसे प्रोफेसर और अर्थशास्त्र का होगा जो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का प्रधानमंत्री बनकर संभावना की हर उड़ान के परे निकल गया या फिर असाधारण नम्रता वाले एक भले आदमी का जो असाधारण नम्रता वाले एक भले नेता में तब्दील हो गया? क्या ये छवि अपने मालिक के आदेश पर जीने और मरने के लिए तैयारे सक्षम सेवक की होगी या फिर चतुराईविहीन अनुयायी के आवरण में छिपे एक चतुर नेता की?

कहा जाता है कि इतिहास सबका निष्पक्ष फैसला करता है. मगर सच ये है कि इतिहास के जरिए भी घटनाओं को समझना कई बार मुश्किल हो जाता है. आखिर कौन कह सकता था कि मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बन जाएंगे और वह भी एक गठबंधन सरकार के. और उससे भी बढ़कर ये कि वे अपना कार्यकाल सफलतापूर्वक पूरा कर जाएंगे.

मनमोहन की सज्जनता और कार्यकुशलता पर दोराय नहीं हो सकती. मगर कितने भी प्रशंसनीय होने पर भी सिर्फ इन गुणों का होना ही काफी नहीं. ये तो कई दूसरे लोगों में भी मिल जाते हैं. एक अरब की आबादी के नेता में लोग इससे कहीं ज्यादा खूबियों मसलन दृष्टि, प्रेरणा, साहस, इच्छाशक्ति, कूटनीति और जनता के मन में झांकने व इतिहास की धारा को बदलने की क्षमता की उम्मीद करते हैं. योजनाओं का कार्यान्वयन अहम गुण है मगर इसके लिए भी व्यवस्था में योग्य लोग मौजूद होते हैं उदाहरण के लिए ब्यूरोक्रेट्स, अर्थशास्त्री आदि.

कुछ लोग दावा करते हैं कि मनमोहन को देखकर उनके बारे में कोई निष्कर्ष बना लेना भूल होगी. उनमें आम भारतीय नेताओं जैसी ठसक और वाकपटुता न होने का मतलब ये नहीं कि वे कमान नहीं साध सकते. बल्कि प्रशंसक तो मानते हैं कि किसी तरह का सतही दिखावा न करना ही मनमोहन को राजनीति के खेल में दूसरों से ज्यादा मंझा हुआ खिलाड़ी साबित करता है. यही वजह है कि वे आज प्रधानमंत्री हैं और वे नहीं जो इस पद के लिए धक्कामुक्की कर रहे थे.

मगर इतिहास की रोशनी में देखने पर मनमोहन के मंझे हुए राजनीतिक होने का ये तर्क लड़खड़ाने लगता है. हर बार ये साफ नजर आता है कि अपनी मर्जी से काम करने की बजाय उन्होंने वही किया जो उनसे करने को कहा गया. नरसिम्हा राव की सरकार में वित्तमंत्री का उनका कार्यकाल इसका उदाहरण है. प्रधानमंत्री के तौर पर भी उन्होंने वही किया जो उनसे पार्टी या सीधे-सीधे कहा जाए तो सोनिया गांधी ने करने को कहा. दिशानिर्देश सोनिया के रहे और पालन करने के तरीके शायद उनके अपने. ये भी हो सकता है कि उनके विचार काफी हद तक सोनिया से मिलते थे मगर फिर उन पर अमल भी इसीलिए हुआ क्योंकि उन्हें मनमोहन के नहीं बल्कि सोनिया के विचारों के तौर पर देखा गया. बड़े फैसले आम सहमति के आधार पर लिए गए मगर अक्सर ऐसे मौकों पर सिंह मार्गदर्शन के लिए सोनिया की तरफ ताकते रहे. शायद एक तरह से ये उनके लिए फायदेमंद ही रहा. मनमोहन की विशेषज्ञता का क्षेत्र राज की बजाय अर्थनीति रहा है इसलिए हो सकता है कि जनता की नब्ज को समझने के मामले में सोनिया की छाया ने उन्हें अमूल्य मार्गदर्शन प्रदान किया हो.

पांच साल के कार्यकाल के बाद अगर मनमोहन का मूल्यांकन किया जाए तो शायद उन्हें एक विशुद्ध नौकरशाह के तौर पर देखा जाएगा जो सिर झुकाए अपना काम करता रहा और अपने लिए तय दायरे से बाहर कभी भी नहीं गया, जिसने कभी किसी के साथ पंगा नहीं लिया और जो हमेशा दिशानिर्देशों का इंतजार करता रहा. एक ऐसा शख्स जिसका सम्मान उसके व्यक्तित्व की नहीं बल्कि उसके पद की वजह से ज्यादा हुआ और जो शायद प्रधानमंत्री न होता तो 100 करोड़ क्या 100 लोगों का भी नेता नहीं हो सकता था.

मनमोहन सिंह के कार्यकाल को कॉरपोरेट जगत और अमीरों के राज के रूप में देखा जाएगा जिसमें आम आदमी का जिक्र दो बार हुआ. पहली बार तब जब सभी पूर्वानुमानों को धता बताते हुए यूपीए सत्ता में आया और उसने अति कृतज्ञता जताते हुए आम आदमी का राग अलापा. और दूसरी बार पिछले नौ महीनों के दौरान, जब उसे ये अहसास हुआ कि अब वापस उसी परेशान मतदाता की देहरी पर जाना है. इसके अलावा प्रधानमंत्री के कार्यकाल का ज्यादातर हिस्सा इस देश के अमीरों को समर्पित रहा. वे अक्सर व्यापारिक घरानों और मीडिया हाउसों के उन आयोजनों में दिखते रहे जिनका कोई खास मकसद नहीं होता था. पैसे की बोली बोलने वालों से मिलने के लिए हमेशा उनके पास वक्त रहा जबकि जनता की भाषा बोलने वालों को जंतर-मंतर पर धरना देकर या 10 जनपथ के आगे लाइन लगाकर संतोष करना पड़ा.

अमीर वर्ग के लिए उनका ये झुकाव अजीब था. ऐसा लगा जैसे उन्होंने उस अहम सबक पर ध्यान नहीं दिया जो भारत के हर नेता को कंठस्थ होना चाहिए. वह सबक ये है कि अपनी हर बात और काम से भारत के प्रधानमंत्री को देश के गरीबों और वंचितों का प्रतिनिधि लगना चाहिए. ये एक ऐसा नियम है जिसका कम से कम तब तक अनिवार्य रूप से पालन होना ही चाहिए जब तक हमारे देश में हर बच्चे को पर्याप्त शिक्षा और भोजन न मिलने लगे या जब तक कुल गरीबों का आंकड़ा गिरकर एक करोड़ तक न आ जाए. रिकार्ड के लिए बता दें आज ये आंकड़ा पचास करोड़ के करीब है.

हालांकि इस विशुद्ध नौकरशाह ने इस देश की असल बीमारियों को दूर करने के मकसद से भी कुछ काम किए मगर तभी जब हाईकमान ने ऐसा करने के लिए कहा. सूचना के अधिकार और राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना इसके उदाहरण हैं. मगर ज्यादातर मौकों पर वे खुद को एक ऐसे नेता के रूप में पेश करने में विफल रहे जो मुश्किलों से जूझ रहे देश के लोगों में उम्मीद पैदा कर सके. नक्सल समस्या पर उनके बयान बुरे सुझाव का नतीजा दिखे, गुजरात पर उनकी खामोशी भयावह रही और किसानों को आत्महत्या करने से रोकने के उनके उपाय बेअसर साबित हुए. और सबसे महत्वपूर्ण पर्यावरण को बचाने के मुद्दे पर तो उनका कार्यकाल शायद विपरीत प्रभावकारी रहा. जनता बनाम पूंजीपतियों की हर लड़ाई में वे जनता के साथ खड़े नहीं दिखे.हां, एक मुद्दे पर उन्होंने जरूर दृढ़ता दिखाई मगर इसने उनकी साख बढ़ाने के बजाय उनकी प्राथमिकताओं और जुड़ाव पर नए सवाल खड़े कर दिए. परमाणु करार के फायदे और नुकसान क्या होंगे ये तो सही मायनों में आने वाला वक्त ही बता सकता है मगर फिलहाल तो इस करार ने मनमोहन की विश्वबैंक और अमेरिका समर्थक छवि को बिल्कुल पक्का कर दिया है.

एक मुद्दा ऐसा भी रहा जिस पर उन्होंने राजनेता जैसे धैर्य का परिचय दिया और इसका श्रेय हमेशा उन्हें दिया जाएगा. पिछले साल 26 नवंबर को मुंबई में हुए हमले के बाद जब मीडिया सहित हर कोई पाकिस्तान के खून का प्यासा हो रहा था तो प्रधानमंत्री संतुलित रहे. उनकी प्रतिक्रिया में किसी अपरिपक्व देश के गुस्से की बजाय एक महान राष्ट्र की दूरदर्शिता दिखी.

यही शांतचित्तता उनकी स्थायी विरासत का एक भाग हो सकती है. उन्होंने कोई आवरण नहीं ओढ़ा और जैसे थे वैसे ही बने रहे. इस तरह उन्होंने शीर्षस्तर पर राजनीति के ओछेपन का स्तर कम किया. इसके लिए हमें उनका शुक्रगुजार होना चाहिए कि अगर उन्होंने सार्वजनिक आचरण के गिरते मानदंडों को अगर उठाया नहीं तो और गिराया भी नहीं.

विडंबना ये है कि इतिहास आखिरकार उनके बारे में फैसला इस आधार पर नहीं करेगा कि वे क्या थे और उन्होंने क्या किया. ये फैसला इस आधार पर होगा कि उनके जाने के बाद क्या परिदृश्य बनता है. अगर हिंदू दक्षिणपंथी ताकतें मजबूत होकर सत्ता में वापसी करती हैं तो उन्हें ऐसे नेता के तौर पर देखा जाएगा जिसने तूफान को रोकने के लिए पर्याप्त कोशिश नहीं की. उधर, राहुल गांधी अगर कांग्रेस में नई जान फूंकने में कामयाब हो गए तो मनमोहन को नेहरू-गांधी खानदान की कहानी में उस फुटनोट के तौर पर देखा जाएगा जिसने एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में सत्ता हस्तांतरण को सुगम बनाया. लेकिन यदि इसके बाद देश और भी ज्यादा अवसरवादी गठबंधनों, संकीर्ण राजनीति और प्रशासकीय अराजकता के दौर में धंसता है तो उन्हें समझदार और संतुलित नेताओं के दौर के आखिरी व्यक्तित्व के रूप में याद किया जाएगा.

एक बार फिर से वही सवाल. अपने मन के आइने में झांकने पर मनमोहन को किस तरह का अक्स नजर आएगा? शायद उन्हें एक ईमानदार और परिश्रमी व्यक्ति का प्रतिविंब दिखेगा जिसने ऐतिहासिक संयोग से मिले हर मौके पर अपनी नम्रता और कृतज्ञता बनाए रखी, जो महान नहीं तो सही मायनों में असाधारण तो रहा ही और जिसमें साहस से ज्यादा सज्जनता और इच्छाशक्ति से ज्यादा इच्छापालन की भावना रही. देखा जाए तो उनका प्रदर्शन ठीक-ठाक रहा. जैसे हालात थे उनमें मनमोहन इतना ही कर सकते थे.

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कोई भी मूल्य एवं संस्कृति तब तक जीवित नहीं रह सकती जब तक वह आचरण में नहीं है.

20090503

स्विस बैंक, सफ़ेदपोश नेता और, काला धन

अभी हाल ही में The New Indian Express में प्रकाशित गुरुमूर्ति जी का लेख (Who will probe first family's billions?) पढ़ा.

इस लेख में जो भी पढ़ने को मिला तो एक पल को विस्मित हो गया था..... पर अब जैसा कि रोज़-रोज़ ऐसे वाकिये सुनने की आदत हो गयी है सो अपने को सँभाल लिया.

सोचने की बात है कि (बातें तो और भी हैं पर कोई सोचता ही नहीं):

१- काले धन पर जब दुनिया के बहुत सारे देश मुहिम छेड़े हुए हैं तब भारत के माननीय प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी बिना एक शब्द बोले G-20 देशों की बैठक से वापिस आ गये. इसका उत्तर अति-शिक्षित मनमोहन सिंह जी के पास नहीं है.

२- एक सौ करोड़ से अधिक की जनसंख्या वाले देश का प्रधानमंत्री Nuclear Deal पर हस्ताक्षर करने के छः माह बाद ये खुलासा करे कि यदि ये deal नहीं होती तो वह त्यागपत्र दे देता. ये कथन क्या प्रकट कर रहा है?

और मुद्दों पर न जाते हुए केवल इन्हीं दो उदाहरणों से एक बात साफ़ हो जाती है कि सत्ता की कुंजी उनके हाथ में नहीं है. और वह एक सहायक की भाँति वही बोलते और करते हैं जो उनको बोला जाता है... अर्थात कठपुतली प्रधानमंत्री. इसके विपरीत यदि वो सारे निर्णय स्व-विवेक से लेते हैं तो देश हित से जुड़े उन दो मुद्दों पर जो पूर्णरूप से स्पष्ट थे ऐसा राष्ट्रघाती निर्णय कैसे ले सकते हैं.

जैसा कि स्पष्ट है कि दोनों मुद्दे पैसे से जुड़े हैं पहला रिश्वत का काला धन एकत्र करने के संदर्भ में और दूसरा किसी भी deal में मिलने वाली रिश्वत के संदर्भ में. आप बतायें कि क्या ये घोटाले नहीं हैं? वो बात अलग है कि ये सब घोटाले वो पार्टीहित में कर रहे हैं. प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन जी एक नयी गाथा लिखी है. अपनी गलतियां और कमजोरियां छिपाने के लिये वो अपना RESUME पढ़ कर सुनाने लगते हैं.

अब फ़िर से गुरुमूर्ती जी के लेख पर आते हैं. पत्रिका के हवाले से उन्होंने तीन बातें सामने लाईं हैं:


1- $2.2 billions in Rajiv's secret accounts, says Swiss magazine, Schweizer Illustrierte (November 11, 1991).


2- Family benefited from KGB, says book.


3- Bofors slush payoff to ‘Q’.

आप जानते हैं कि ये तीन ख़तरे हैं कांग्रेस के लिये. कांग्रेस और इस देश के नये कर्णधार राहुल गाँधी कहते हैं कि सत्ता में आने के बाद वो इसकी जाँच कराएंगे. आपको लगता है कि जाँच होगी???
क्वात्रोकी को सोनिया अम्मा की दोस्ती से जो फ़ायदे हुए उस बोफ़ोर्स घोटाले की जाँच तो अभी भी चल रही है... ये जाँच तो शायद मेरे पोते भी देखेंगे.

अब आप बतायें कि एक पढ़ा लिखा आदमी केवल सत्ता के लालच में एक देशद्रोही परिवार की पार्टी का हित साधने में मगन है और हम हैं कि उन सबको बार-बार जिता कर संसद भेज देते हैं.

मेरा प्रश्न इस देश की जनता से है जो Internet का प्रयोग करती है, अपने को पढ़ा-लिखा और समझदार बोलती है: कब तक करते रहेंगे यह गलती, कब लेंगे सबक?
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कोई भी मूल्य एवं संस्कृति तब तक जीवित नहीं रह सकती जब तक वह आचरण में नहीं है.

20090430

काले धन पर बेरुखी

डा. मनमोहन सिंह और उनकी सरकार स्विस बैंकों में जमा हजारों करोड़ रुपये का धन वापस भारत लाने में रुचि क्यों नहीं ले रही है? क्या कारण है कि जब विश्व के अधिकाश देश स्विस बैंकों में जमा अपने-अपने देश का काला धन वापस पाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं तो भारत सरकार पिछले एक साल से इस विषय में या तो मौन है या बहानेबाजी पर उतारू है। यह स्थापित सत्य है कि पिछले 60 वषरें में भारत की अकूत संपत्ति भ्रष्ट नेताओं, अधिकारियों और करचोर व्यापारियों के द्वारा स्विस बैंकों में जमा की गई है। काग्रेस भाजपा पर विदेशों में जमा काले धन की राशि को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का आरोप लगा रही है। अमेरिका स्थित 'ग्लोबल फाइनेंसियल इंटेग्रिटी' के ताजा अनुमान के अनुसार भारत से प्रतिवर्ष 1,35,000 करोड़ रुपये स्विस बैंक आदि में जमा कराया जाता है। 160 विकासशील देशों की सूची में भारत का स्थान पाचवा है। जीएफआई के अनुसार 2002 से 2006 के बीच भारत से औसतन 1,13,500 करोड़ रुपये से 1,36,500 करोड़ रुपये (22.7 अरब से 27.3 अरब डालर) प्रतिवर्ष काला धन विदेशी बैंकों में जमा होता रहा। जीएफआई के अनुसार विकासशील देशों से इसी अवधि में प्रतिवर्ष एक खरब डालर काला धन विदेशों में जमा हुआ है। वास्तव में राशि का आकार महत्वपूर्ण नहीं है। काले धन की राशि यदि एक रुपया भी हो तो देश से चुराकर ले जाए गए धन की वापसी क्या नहीं होनी चाहिए?

'आर्गेनाइजेशन ऑफ इकोनोमिक कार्पोरेशन एंड डेवलपमेंट' (ओईसीडी) ने अप्रैल 2009 के शुरू में प्रकाशित लेखाजोखा में उल्लेख किया था कि स्विस बैंकों समेत टैक्स चोरी के अन्य स्वर्ग में 25 लाख करोड़ से लेकर 70 लाख करोड़ रुपये की धनराशि है। जर्मन के वित्त मंत्रालय ने एलटीजी बैंक से जो सूची प्राप्त की है उसमें करीब 100 भारतीयों के भी नाम शामिल हैं। काग्रेस यह प्रश्न कर रही है कि भाजपा ने अपने कार्यकाल में उक्त धन को वापस लाने का प्रयास क्यों नहीं किया? यह प्रश्न उतना ही बेतुका है, जैसे कोई यह पूछे कि पं. जवाहर लाल नेहरू ने मोबाइल फोन और कंप्यूटर लाने का प्रयास क्यों नहीं किया? आज से एक वर्ष पूर्व तक पश्चिमी देशों में 'बैंक सीक्रेसी' को व्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देखा जाता था, किंतु अमेरिका में 9/11 के आतंकवादी हमले और वैश्विक आर्थिक मंदी के चलते परिस्थितिया बदलीं और विकसित देशों में इस पर पुनर्विचार प्रारंभ हुआ। लालकृष्ण आडवाणी ने पिछले साल अप्रैल माह में ही डा. मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर समुचित कदम उठाने की अपील की थी। तत्कालीन वित्त मंत्री की ओर से जो जवाब आया उससे सरकार द्वारा कदम उठाने का संकेत मिला था, किंतु धन वापसी की प्रक्रिया प्रारंभ करने की जगह सरकार ने जर्मनी स्थित भारतीय राजदूत को पत्र लिखकर यह निर्देश दिया कि स्विस बैंकों में काला धन रखने वाले भारतीयों का नाम उजागर करने के लिए जर्मनी सरकार पर दबाव नहीं डाला जाए। क्यों?

वैश्विक मंदी के कारण जर्मनी, फ्रांस, अमेरिका, ब्रिटेन आदि आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। दुनिया भर के बैंक कंगाली के कगार पर हैं और यूरोपीय देशों के नेता इसमें स्विस बैंक जैसे टैक्स चोरी के स्वर्ग की गोपनीय कार्यप्रणाली का बड़ा योगदान मानते हैं। यूरोपीय देशों ने जी-20 के मंच से टैक्स चोरों के पनाहगाहों में जमा की गई राशि अपने देश वापस लाने का ऐलान किया। 2008 की तीसरी तिमाही में जर्मन सरकार ने कर चोरों को संरक्षण देने के कारण स्विट्जरलैंड को ब्लैक लिस्ट करने के लिए 'ओईसीडी' पर दबाव डाला। उधर अमेरिका ने विधिक मुकदमे के द्वारा स्विट्जरलैंड के सबसे बड़े बैंक-यूबीएस से करीब 300 अमेरिकी करचोरों के नाम जानने में सफलता प्राप्त की। फरवरी माह में बर्लिन में आयोजित जी-20 की बैठक में यूरोपीय देशों ने यह निर्णय लिया कि अप्रैल में लंदन में होने वाली बैठक में टैक्स चोरी के ठिकानों के खिलाफ वैश्विक मुहिम छेड़ी जाएगी। जी-20 की बैठक के लिए लंदन रवाना होने से पूर्व आडवाणी ने प्रधानमंत्री से कहा कि बैंकिंग गोपनीयता खत्म करने के लिए भारत को जी-20 द्वारा किए जा रहे प्रयासों में सक्रिय भूमिका अदा करनी चाहिए। प्रधानमंत्री ने सलाह अनसुनी कर दी। काग्रेस ने कहा कि जी-20 ऐसे मामलों को उठाने का उपयुक्त मंच नहीं है, जबकि सत्य यह है कि जी-20 की लंदन बैठक का मुख्य एजेंडा ही काला धन और टैक्स चोरी के ठिकाने थे। काग्रेस इस मामले में झूठ क्यों बोल रही है? फ्रांस के राष्ट्रपति सरकोजी ने तो बैंकों की गोपनीयता और टैक्स चोरी के ठिकाने खत्म करने के लिए यदि कुछ नहीं किया गया तो जी-20 के बहिष्कार की धमकी दे रखी थी।

काग्रेस नीत सरकार काले धन की वापसी के प्रश्न पर इतनी घबराई हुई क्यों है? उसकी विवशता क्या है? इन प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए हमें बोफोर्स दलाली काड को याद करना होगा। अस्सी के दशक में रिलायंस घोटाले के सिलसिले में एक अंग्रेजी दैनिक की ओर से एस. गुरुमूर्ति को जानकारी जुटाने का भार सौंपा गया था। इस विषय में हाल में गुरुमूर्ति ने अपने एक लेख में लिखा है, ''मैंने देश से बाहर जमा कराए गए काले धन का पता लगाने के लिए अमेरिकी जासूसी फर्म-फेयरफैक्स से संपर्क किया। मैंने भारत सरकार से फेयरफैक्स को जाच कार्य सौंपने का निवेदन किया। स्विस सूत्रों के अनुसार तब काले धन के रूप में करीब 300 अरब डालर स्विस बैंकों में जमा थे, किंतु 13 मार्च, 1987 को मुझे सीबीआई ने फर्जी आरोपों में गिरफ्तार कर लिया। बाद में आरोप बेबुनियाद साबित हुए। पूरे देश को पता लग गया कि सरकार ने मुझे निशाना क्यों बनाया? सरकार को अंदेशा था कि इस जाच से सत्ताधारी 'परिवार' की बोफोर्स दलाली और काली कमाई का भी खुलासा हो जाएगा। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाधी ने विनोद पाडेय, भूरे लाल जैसे ईमानदार प्रशासनिक अधिकारी को हटाने के साथ जाच की हामी भरने वाले तत्कालीन वित्तमंत्री वीपी सिंह को भी हटा दिया था।''

1984 की सहानुभूति लहर में विपक्ष का सूपड़ा साफ करने वाले राजीव गाधी को 1989 के चुनाव में शर्मनाक पराजय का मुंह देखना पड़ा, जिसमें भ्रष्टाचार ही बड़ा चुनावी मुद्दा था। काले धन के मामले से काग्रेस को बोफोर्स का भूत जिंदा होने का अंदेशा है। राजग के काल में क्वात्रोच्चि का खाता सील कराया गया था, जिसे संप्रग सरकार के काल में हटवा दिया गया। क्वात्रोच्चि बोफोर्स लूट का माल निकालने में सफल रहा। एक अनुमान के अनुसार स्विस बैंकों में जमा राशि हमारे कुल बजट का तीन गुना हिस्सा है। इस काले धन की वापसी से भारत की अर्थव्यवस्था का कायापलट हो सकता है। आज भारत पर 220 अरब डालर का विदेशी कर्ज है, हम उससे छुटकारा पा सकते हैं। आधारभूत संरचनाओं के विकास के लिए हमें वित्तीय कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ेगा. काले धन की वापसी की राह में रोड़े अटका कर काग्रेस वस्तुत: अपने दामन पर लगे बोफोर्स जैसे दागों को स्वयंसत्यापित कर रही है.
(बलबीर पुंज)
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कोई भी मूल्य एवं संस्कृति तब तक जीवित नहीं रह सकती जब तक वह आचरण में नहीं है.

20090418

To declare you are not voting...

Rule 49-O, framed in 1961, gives you the right not to vote, but few know about it. One doesn’t know what the Election Commission’s Manual of Election Law looks like. So he has never had to turn to Page 72, where, at the bottom, is an innocuous detail that goes by the name 49(0).

Walk up to the presiding officer, sign the register, ask for Form 49A and say he would like to vote for: nobody. That’s what Rule 49(0) does-the closest Indian voters can get to negative voting.

According to the Conduct of Election Rules, 1961, an elector can refuse to vote after he has been identified and necessary entries made in the register of electors. The EC has no data on the number of people who have used the rule because these “votes” are not counted and there have only been stray incidents of activism so far. But those who believe in the Rule say 49(0) gives people a powerful right: to say ‘No’ without boycotting the democratic process. They hope, at least theoretically, that with better awareness among voters, 49(0) will force political parties to put up better candidates.

According to the Election Commission, barely 2 to 3 voters used Rule 49(0) to not vote in favour of any candidate in the Delhi assembly elections. But VS Sreedhara, who voted under the Rule in the recent Karnataka assembly elections, is willing to believe in, what he calls a hypothesis: “Someday, if the people who turn out not to vote are more than the number of votes a winning candidate gets, if not anything else, it will serve to embarrass the winning candidate.”

But Prof Jagdeep Chokkar of the Association for Democratic Reforms, whose organisation has been pushing for electoral reforms, thinks there should be better and easier ways to express dissent — maybe a “None of the above (NOTA)” option on the EVM or a winning limit of “50 per cent plus one” votes. “Rule 49(0) is self-defeating because the person who uses it has to be so motivated as to stand in a line, wait for his turn and then say he is not voting.”
(www.expressinda.com)
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20090408

Reply to Prof Kanchan Chowdhury’s letter

Mr Ranjan Khastgir, alumnus (Batch of ‘57) replies to Prof. Kanchan Chowdhury’s letter .

Dear Kanchan,

While I fully endorse your views that at the micro level, mismanagement is certainly a cause for the students current plight, at the macro level the responsibility squarely lies with politicians like Arjun Singh and his ilk, who have played caste based politics only for appeasing their vote banks and have almost exponentially inflated the number of IITs, as well as the number of students, with utter disregard to the infra structure and without a thought to maintain, if not upgrade, the declining facilities being provided to them. This has caused utter chaos and will almost certainly bring down the quality of students passing out from the IITs and thus negate the present standing of IIT graduates as world class engineers and technologists.

Having been closely associated with the IIT Alumni Association as well as the current faculty, I have full faith in our present faculty members like Prof Madhusudan Chakraborty, Acting director, Prof Amit Patra, Dean (Alumni Affairs), Prof. B. K. Mathur and their likes. However unless they are given a free hand and full budgetary support, how can we expect them to improve the facilities for the students?

Incidentally, even during our days during the 50’s student demonstrations at IIT KGP were not unheard of, but perhaps not known widely, because of the absence of so many rounds-the clock news channels. We remember demonstrating before the Director’s bungalow, wrapped only in towels, when taps ran dry while we were taking baths at our respective Halls of residence. However, there was certainly no violence or destructive action. The mild violence that has been reported in the media after the tragic death of Rohit is perhaps only a sign of the times, when students with political affiliations create havoc at campuses in Kolkata , with or without any valid cause, provoked by their political masters with the sole objective of coming to power and harvesting money. Compared to such incidents, the demonstrations by the students of IIT KGP, were not only mild, but certainly for a just cause. We are thankful that politicians have still not been able to infiltrate and pollute student activities at IIT KGP.

Let all IITians, past and present, unite to do whatever that is possible to overthrow politicians of the day practicing vote bank politics at the cost of meritocracy at Institutions of academic excellence like the IITs, IIMs and premier medical institutions like AIIMS. Improving living conditions of the students should be an important part of this programme. Donations to associations like Technology Foundation and similar bodies should be put on hold, unless they can show what they are doing to improve the living condition of students with the money they are receiving in abundance from the Alumni, both in India and abroad.

Yours sincerely,
Ranjan Khastgir
1957 B.Tech.(Mech), Azad Hall

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Letter from Alumnus

Below we reproduce a letter written by Prof. Kanchan Chowdhury. Originally posted as a comment it is reproduced here to bring it to the attention of the public.

I am a B. Tech. (Mechanical), Patel Hall, 1973-78 and Ph.D., B.C. Roy Hall, 1979-83. Currently a Professor at Cryogenic Engineering and also, President, IIT Kharagpur Teachers’ Association. Opinion given herein is my personal and necessarily does not reflect that of teachers body IITTA.

I came back at the campus 4 days after Rohit died due to our neglect and heard about the students’ reaction expressing their strong emotion at the Director’s residence. Since, I am also a Professor at IIT and President of the Teachers’ Association, I chose to give our reaction to the current situation in the form of a memorandum submitted to the Chairman, BOG on the 27th March, 2009. However, the alumnus in me has forced me to write this mail to Scholars Avenue.

1. Nobody supports violence. However, to those who are castigating the students for ransacking the Director’s residence, let me tell you that such an incident is not unprecedented at IIT Kharagpur. 33 years ago, in 1976, during the tenure of Prof. C S Jha, the exterior of Director’s residence was ransacked (though on a lower scale) by agitating students aggrieved on mess condition. The difference between 1976 and today is that during our time media was not so active. That is why the incident did not find that attention and has been forgotten.
In spite of many strikes and agitations, we could do nothing to change the condition of the mess and hostel.

2. Medical neglect and death due to negligence is not new at IIT campus. Students are not the only victims. In front of my own eyes, wife of a professor died gasping for breadth, because the ambulance (!) by which she was brought to B C Roy Hospital from her home after an asthmatic attack did not have oxygen cylinder fitted in. In spite of murmurs and talks, nothing happened. When students complain that they are left into the jaws of death, are they really wrong?

3. After becoming a faculty here, I thought I will do something for the students for which I suffered as a student myself. In 1994, I became the Warden of a Hall. I found how the food is stolen and how students’ money is doled out to appease local political party. I tried to stop these practices, but vested interest grouped against me and I was asked to resign. I refused, as I was sure that I am on the right track. Finally, after 90 days of assuming charge, I was sacked by Chairman, Hall Management Committee without citing any reason.
When the students complain that the system is corrupt, are they really far from truth?

4. Though it is true that it is the system that is at the root of all trouble, I completely agree with the students that for any incident, such as Rohit’s death, which may be a lapse of the system, “heads must roll”. Because, in case we assume that the system is doing everything, those particular heads are not important enough to linger on to the chair any way. And in case the heads were doing it and not the system, they must take the responsibility for their action or inaction. Anyway, these are the heads that allowed such a system to perpetuate. Otherwise, in democracy, how shall I make myself being heard? To those who are crying hoarse telling that everything is lost about IIT’s reputation, let me ask you what we have achieved by remaining calm and disciplined for so many years. We have to preserve the brand name called “IIT”. But, Rohit could be my son, your son. Is it not too heavy a price to pay for so-called IIT brand name, when the Ministry of HRD has already decided to dilute the brand by establishing about two dozens of IITs within a short span of time and huddled the students like cattle in rooms by increasing the intake before the infrastructure was in place?

5. We failed in our time as we could not sustain our tempo and were disorganized. Please go through the letter that the students have submitted to Chairman, BOG on the 27th March, 2009 and you will be amazed at the maturity of the tone and language. Students, please be assured that, you are much better than what we were 30 years ago. But, please focus on the final goal and I wish you all the best.

6. Teachers at IIT are deeply agitated for the way they are treated and feel alienated at all levels. Because of the lack of clear path towards professional advancement and absence of campus amenities such as school, college and hospital, IIT Kharagpur is lagging far behind in attracting the brightest and the best as the faculty. I am duty-bound, as the President of the Teachers Association to highlight these issues in the coming days and they will be done. For your records, I am appending the text of the memorandum that we submitted to Chairman, BOG (through acting Director, IIT) on the 27th March, 2009 as a reaction to the recent incident:

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IIT KHARAGPUR

27 March 2009

Joint Memorandum submitted to the Honourable Chairman, Board of Governors, IIT Kharagpur by Teachers, Employees and Officers

1. IIT community deeply mourns the sad demise of young Rohit Kumar prematurely. The incidents that took place on the 22nd of March 2009, were also unfortunate and needs to be avoided in future. The members of the IIT community feel that though it was triggered by the sad death of Rohit Kumar, but was in fact an expression of cumulative grievances. While we are pained by the undesirable behavior of the students, we urge upon all concerned to establish better rapport with the students and initiate creation of a congenial atmosphere through discussions with the students, taking their feelings in confidence and initiate measures to address their needs of better health-care and better living conditions in the halls, without further delay. The message that the students are a pivotal and integral part of the IIT community and that they will never be considered adversaries must be widely communicated.

2. Concrete steps to revamp the health care system, by trying all avenues including participation of private hospitals should be undertaken immediately. The planning must include the right medical professionals in the process. There is a need to document in no uncertain terms the limited capabilities of the B. C. Roy hospital and also the list of medical emergencies where the risk factor in offering proper health care to the community substantially shoots up. This knowledge must be available to each and every member of the community including the students. Immediate short-term measures such as round the clock availability of doctors, filling up all vacant positions in the hospital by competent and able persons, must be immediately addressed. The doctors of the B. C. Roy hospital should also be taken into confidence, to understand the problems they face in the current infrastructure.

3. It must be ensured that all further expansion proposals with respect to students’ intake must be kept in complete abeyance, till the proper infrastructure development and manpower deployment are actually put in place. The student facilities and amenities, such as reasonable accommodation, food, water supply and medical services should be looked into first. Till these aspects are taken care of and proper infrastructure required for further expansion in intake is put in place, the expansion trend should be stopped immediately to avoid a potential recurrence of the previous Sunday in an Institution which claims International standing . IIT must intimate the MHRD accordingly, and insist upon it to permit IIT Kharagpur to carry forward its hard earned legacy of quality and fair treatment.

Professor Kanchan Chowdhury (chowdhury.kanchan(at)gmail.com)
President, IITTA
President, (TEAK)
President, IITEU


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 Responses to “Letter from Alumnus”
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 Anon Says:

1. I am also a KGP alumunus and I am a part of the system working here. Kudos to Prof. Kanchan Choudhry for calling a spade a spade.

2. I urge that the students remain united and fight for their rights undaunted. Do not succumb to divisive forces which are now working very actively to create a divide amongst the students.

3.The system at IIT KGP vests power in the hands of a few. We have a single person holding mutiple important portfolios, like both Dean ship & Head ship, GATE chairman/ Transport incharge to name a few. Is there a dearth of people that a single man has to handle multiple important things? Such ‘important people’ are neither doing justice to their teaching or their administrative responsibilities. It should be a one man one portfolio with full accountability, whatever the portfolio. Before this incident how many students knew who was the Hospital committe chairman or the transport committee chairman?

4. Go ahead and have a sound legal cell (do not get the Adminstration’s (mis)advice) to advise on all matters relating to academics, health care, insurance and other important services in the campus.

Wishing the student community all the best in their endevaour. Remember, you are the main component of the system. None of us would have existed here but for you.

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